Akola High Court Dismissed Teacher Petition: अकोला महानगरपालिका के एक बर्खास्त शिक्षक को अपील का उपलब्ध कानूनी मार्ग अपनाने के बजाय सीधे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना भारी पड़ गया। न्यायाधीश अनिल पानसरे और न्यायाधीश रजनीश व्यास ने याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगा दिया, नरेश मूर्ति नामक व्यक्ति अकोला महानगरपालिका में पिछले 34 वर्षों से शिक्षक के पद पर कार्यरत थे।
इसके अलावा वे मनपा कर्मचारियों की सहकारी क्रेडिट सोसाइटी के संचालक भी थे। जानकारी के अनुसार, उनके खिलाफ धोखाधड़ी सहित अन्य गंभीर आपराधिक मामले दर्ज होने के बाद उनके विरुद्ध एक विभागीय जांच की गई थी। इस जांच में दोषी पाए जाने के बाद उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था।
महाराष्ट्र सिविल सेवा (अनुशासन और अपील) नियमों के तहत इस बर्खास्तगी की कार्रवाई के खिलाफ 'अपीलीय प्राधिकारी' के समक्ष अपील करने का स्पष्ट प्रावधान मौजूद था। इसके बावजूद मूर्ति ने इस कानूनी विकल्प का उपयोग न करते हुए सीधे उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी।
मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कड़े शब्दों में नाराजगी व्यक्त की। अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि जब वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध हों तो सीधे हाई कोर्ट आना उचित नहीं है और ऐसी याचिकाओं से अदालत का कीमती समय बर्बाद होता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक किसी मौलिक अधिकार के उल्लंघन का मामला न दिखाया गया हो तब तक सीधे हाई कोर्ट में याचिका दायर करना न्यायसंगत नहीं है। साथ ही अदालत ने यह भी साफ किया कि पक्षकारों को अपनी सुविधा के अनुसार न्यायालय चुनने का अधिकार नहीं है।
याचिका को खारिज कर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाते हुए भी न्यायालय ने नरेश मूर्ति को पूरी तरह से राहत के रास्ते बंद नहीं किए हैं। अदालत ने उनके लिए नियमानुसार संबंधित अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष अपील करने का विकल्प अभी भी खुला रखा है।
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कानूनी उपाय उपलब्ध हों तो सीधे हाई कोर्ट आना उचित नहीं है और ऐसी याचिकाओं से अदालत का कीमती समय बर्बाद होता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक किसी मौलिक अधिकार के उल्लंघन का मामला न दिखाया गया हो तब तक सीधे हाई कोर्ट में याचिका दायर करना न्यायसंगत नहीं है। साथ ही अदालत ने यह भी साफ किया कि पक्षकारों को अपनी सुविधा के अनुसार न्यायालय चुनने का अधिकार नहीं है।