

DRDO Space Based Detection Technique: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव और सैन्य कार्रवाई के बीच मिसाइल हमलों से निपटना बड़ी चुनौती रहा। जमीन पर मौजूद रडार से मिलने वाली जानकारी के आधार पर कई बार खतरे का पता उड़ान के आखिरी चरण में चलता है। ऐसे में मिसाइल को रोकने के लिए समय बेहद कम बचता है। यही वजह है कि भारत अब स्पेस आधारित मिसाइल डिटेक्शन क्षमता मजबूत करने पर जोर दे रहा है।
स्पेस आधारित अर्ली वॉर्निंग सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि सैटेलाइट मिसाइल लॉन्च के तुरंत बाद उसके गर्म एग्जॉस्ट प्लम को इंफ्रारेड सेंसर से पकड़ सकता है। जबकि जमीन पर मौजूद रडार के सामने क्षितिज और दूरी जैसी सीमाएं होती हैं। यही वजह है कि भारत अब अपना स्वदेशी स्पेस-आई टेक्नोलॉजी विकसित करने की कोशिश कर रहा है। आइए आपको बताते हैं कि स्पेस-आई टेक्नोलॉजी के क्या फायदे हैं? यह कैसे भारत की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाएगा?
ऑपरेशन सिंदूर को लेकर कुछ नई बातें सामने आई हैं। पता चला है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने दिल्ली को निशाना बनाते हुए मिसाइलें दागी थी। जिसे ठीक दो मिनट पहले हरियाणा के सिरसा में रोक लिया गया था। इस घटना ने सरकार के सामने कई सवाल खड़े कर दिए और देश की मिसाइल डिटेक्शन क्षमता को लेकर सोचने पर मजबूर कर दिया। इसके बाद सरकार ने अब अपना स्वदेशी स्पेस-आई टेक्नोलॉजी विकसित करने जा रही है, ताकि भविष्य में ऐसी किसी भी घटना से बचा जा सके।
बैलिस्टिक मिसाइल की उड़ान को सामान्य तौर पर तीन चरणों में समझा जाता है।
बूस्ट फेज: इंजन तेजी से काम करता है।
मिडकोर्स फेज: मिसाइल लंबी दूरी तय करती है।
टर्मिनल फेज: जब मिसाइल लक्ष्य की ओर लौटती है।
स्पेस सेंसर शुरुआती चरण में जानकारी देकर एयर डिफेंस को बेहतर तैयारी का मौका दे सकते हैं। मिसाइल लॉन्च की शुरुआती जानकारी मिलने से एयर डिफेंस नेटवर्क के पास प्रतिक्रिया तैयार करने के लिए ज्यादा समय हो सकता है। सेंसर, रडार, कमांड सिस्टम और इंटरसेप्टर के बीच तालमेल पहले शुरू किया जा सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर मिसाइल को आसानी से रोक लिया जाएगा। हालांकि, शुरुआती चेतावनी से खतरे की पहचान, ट्रैकिंग और जवाबी कार्रवाई के लिए उपलब्ध समय बढ़ सकता है।
भारत लगातार बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम की क्षमताओं को मजबूत कर रहा है। DRDO ने एटमॉस्फियर के बाहर और अंदर आने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों को इंटरसेप्ट करने की क्षमता के परीक्षणों की जानकारी दी है। ऐसे सिस्टम को स्पेस आधारित अर्ली वॉर्निंग से जोड़ने पर एयर डिफेंस नेटवर्क को खतरे की पहले जानकारी मिल सकती है। इससे अलग-अलग चरणों में इंटरसेप्शन की संभावनाएं बेहतर हो सकती हैं।
स्पेस आधारित मिसाइल इंटरसेप्टर का सबसे बड़ा फायदा अर्ली वॉर्निंग है। सैटेलाइट बड़े इलाके पर लगातार निगरानी रखने में मदद कर सकते हैं और लॉन्च के शुरुआती संकेत पकड़ सकते हैं। इससे एयर डिफेंस को प्रतिक्रिया के लिए अतिरिक्त समय मिल सकता है। दूसरा फायदा यह है कि जमीन पर मौजूद रडार को पहले से संदिग्ध इलाके की जानकारी मिल सकती है, जिससे ट्रैकिंग प्रक्रिया ज्यादा प्रभावी हो सकती है।
हालांकि इस तकनीक की कुछ सीमाएं भी हैं। सैटेलाइट किसी मिसाइल के लॉन्च का पता लगा सकता है, लेकिन केवल चेतावनी मिलने से इंटरसेप्शन सुनिश्चित नहीं होता। इसके लिए सटीक ट्रैक, मजबूत कमांड नेटवर्क, फायर-कंट्रोल सिस्टम और सही समय पर काम करने वाला इंटरसेप्टर जरूरी है। अगर इनमें से किसी एक हिस्से में समस्या आती है, तो शुरुआती चेतावनी मिलने के बावजूद मिसाइल को रोकना मुश्किल हो सकता है।
स्पेस आधारित निगरानी के सामने एक बड़ी चुनौती समुद्र से होने वाले मिसाइल लॉन्च है। समुद्र का क्षेत्र बहुत बड़ा होता है और वहां लॉन्च की जगह पहले से तय करना कठिन हो सकता है। सैटेलाइट को उस समय संबंधित क्षेत्र पर प्रभावी निगरानी करनी होगी। इसके साथ ही बादल, सेंसर कवरेज, तकनीकी सीमाएं और लगातार निगरानी की जरूरत इस पूरी व्यवस्था को जटिल और महंगा बनाती है।
भारत और पाकिस्तान भौगोलिक रूप से करीब हैं, इसलिए मिसाइल हमले की स्थिति में प्रतिक्रिया का समय सीमित हो सकता है। ऐसी स्थिति में कुछ मिनट की अतिरिक्त चेतावनी भी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। स्पेस आधारित सेंसर लॉन्च की शुरुआती जानकारी देकर एयर डिफेंस को पहले सक्रिय होने का मौका दे सकते हैं। इससे केवल प्रतिक्रिया तेज नहीं होगी, बल्कि संभावित खतरे का आकलन और तैयारी भी पहले शुरू हो सकेगी।
इस तकनीक का फायदा केवल मिसाइल रोकने तक सीमित नहीं है। अगर किसी देश को भरोसा हो कि उसकी मिसाइल गतिविधियों का शुरुआती चरण में ही पता लगाया जा सकता है, तो अचानक हमला करने की रणनीतिक संभावना कम हो सकती है। बेहतर निगरानी से दोनों पक्षों को स्थिति समझने और निर्णय लेने के लिए अधिक समय मिल सकता है। इस तरह अर्ली वॉर्निंग सिस्टम डिटरेंस और संकट नियंत्रण में भी भूमिका निभा सकता है।
भारत के लिए असली चुनौती केवल सैटेलाइट लॉन्च करना नहीं, बल्कि उन्हें जमीन आधारित रडार, कमांड सेंटर और इंटरसेप्टर सिस्टम से जोड़ना है। स्पेस से मिली सूचना तभी उपयोगी होगी जब उसे तेजी से जमीन पर मौजूद रक्षा नेटवर्क तक पहुंचाया जा सके। इसलिए भविष्य की एयर डिफेंस व्यवस्था में सैटेलाइट, रडार, सेंसर, कमांड सिस्टम और इंटरसेप्टर के बीच तेज और भरोसेमंद तालमेल सबसे महत्वपूर्ण होगा।
स्पेस आधारित मिसाइल अर्ली वॉर्निंग भारत को समय, निगरानी और रणनीतिक बढ़त दे सकती है। लेकिन इसके लिए बड़े स्तर पर सैटेलाइट नेटवर्क, सेंसर, ग्राउंड स्टेशन, सुरक्षित कम्युनिकेशन और लगातार रखरखाव की जरूरत होगी। तकनीक जितनी उन्नत होगी, लागत और जटिलता भी उतनी बढ़ेगी। इसलिए भारत को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी जो लगातार निगरानी के साथ-साथ साइबर और तकनीकी खतरों से भी सुरक्षित रहे।