पुण्यतिथि विशेष: कभी नहीं जीते आम चुनाव, फिर भी वाजपेयी-मोदी सरकार में बने मंत्री! अरुण जेटली की अनोखी कहानी

Arun Jaitley Death Anniversary: 28 दिसंबर 1952 को दिल्ली में जन्मे अरुण जेटली छात्र जीवन में जीत के साथ ही राजनीति में कदम रखने वाले नेता थे। वह 1970 का दशक था, जब एक तेजस्वी नेता का उदय हुआ।
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पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली(AI जेनरेटेड इमेज)
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Arun Jaitley Death Anniversary Special: देश के वित्त मंत्री रहे अरुण जेटली की कहानी राजनीति के उस पहलू को दर्शाती है, जिसमें वे सियासत की बुलंदियों तक तो पहुंचे लेकिन कभी चुनावी राजनीति की बिसात से तालमेल नहीं बिठा सके। उनकी ईमानदार और साफ छवि लोगों के दिलों में घर जरूर कर चुकी थी लेकिन वे अपने चार दशक से अधिक लंबे राजनीतिक करियर में कभी कोई आम चुनाव नहीं जीत सके।

यह अरुण जेटली की असाधारण नेतृत्व क्षमता का ही नतीजा था कि वाजपेयी सरकार हो या फिर नरेंद्र मोदी की सरकार, उनके पास हमेशा बड़े-बड़े मंत्रालय रहे। उन्हें हमेशा वित्त, कानून और रक्षा जैसे मंत्रालय दिए गए।

GST से रेल बजट जैसे ऐतिहासिक फैसले

देश की टैक्स सिस्टम को जीएसटी के रूप में बदलना और रेल बजट का आम बजट में विलय जैसे ऐतिहासिक निर्णय उन्हीं के कार्यकाल में लिए गए। हालांकि, 2000 से 2018 के बीच केंद्र में अरुण जेटली की राजनीति राज्यसभा सदस्य के सहारे टिकी रही। 2014 में जेटली ने क्रिकेटर से राजनेता बने नवजोत सिंह सिद्धू की जगह पार्टी के उम्मीदवार के रूप में अमृतसर सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा, जिसमें उनका मुकाबला कांग्रेस के अमरिंदर सिंह से था। जेटली को अपने जीवन के एकमात्र आम चुनाव में हार का सामना करना पड़ा।

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केंद्रीय वित्त मंत्री के रूप में कार्यभार ग्रहण करते अरुण जेटली(सोर्स- सोशल मीडिया)

28 दिसंबर 1952 को दिल्ली में जन्मे अरुण जेटली छात्र जीवन में जीत के साथ ही राजनीति में कदम रखने वाले नेता थे। वह 1970 का दशक था, जब एक तेजस्वी नेता का उदय हुआ। जेटली दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव जीतकर राजनीति के चुनौती भरे मैदान में कदम रख चुके थे। छात्र नेता के रूप में आपातकाल के समय इंदिरा गांधी का कड़ा विरोध करके अपनी दमदार नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया।

जब गिरफ्तारी के लिए घर पहुंची थी पुलिस

बात 25 जून 1975 की है, दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष अरुण जेटली अपने नारायणा विहार वाले घर के आंगन में सोए हुए थे। बाहर कुछ आवाज हुई तो एकाएक नींद खुल गई। बाहर निकलकर देखा तो उनके पिता कुछ पुलिसकर्मियों से बहस कर रहे थे। ये पुलिसकर्मी उन्हें गिरफ्तार करने आए थे। घर के बाहर का नजारा देखते ही अरुण जेटली ने कदम पीछे खींचे और घर के पिछले दरवाजे से बाहर निकल गए।

रात काटनी थी, तो उन्होंने अपने दोस्त के यहां ठिकाना ढूंढ लिया, जो उसी मोहल्ले में रहता था। अगली सुबह जेटली ने एबीवीपी के सैकड़ों छात्रों को दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर के ऑफिस के सामने लाकर खड़ा कर दिया। वहां अरुण जेटली का भाषण हुआ और सभी ने मिलकर इंदिरा गांधी का पुतला जलाया। आपातकाल के उस दौर में अरुण जेटली गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें तिहाड़ जेल भेजा गया। उन्हें तिहाड़ जेल में 19 महीने तक कैद में रहना पड़ा।

जेल में वाजपेयी और आडवाणी से मुलाकात

अरुण जेटली को तिहाड़ जेल की उसी सेल में रखा गया, जहां अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे दिग्गज नेता कैद थे। कहा जाता है कि तिहाड़ जेल की इस यात्रा का अरुण जेटली को बहुत बड़ा फायदा मिला। जेल से निकलने के साथ-साथ अरुण जेटली वकालत भी करने लगे। 1989 में वीपी सिंह सरकार ने उन्हें एडिशनल सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किया। एडिशनल सॉलिसिटर जनरल रहते जेटली को बोफोर्स जैसे केस की जिम्मेदारी मिली। इसी घोटाले की वजह से 1989 के चुनाव में राजीव गांधी हार गए थे।

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भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज के साथ अरुण जेटली(सोर्स- सोशल मीडिया)

उधर, धीरे-धीरे उस युवा नेता का राजनीतिक कद बढ़ता गया। फिर वो समय आया, जब एक नाम भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में शुमार होने लगा। जेटली 1980 में भाजपा में शामिल हुए और 1991 में इसकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बने।

वाजपेयी सरकार में पहली बार बने मंत्री

बतौर प्रवक्ता जेटली ने अपनी दलीलों से पार्टी की विचारधारा को आगे बढ़ाया। वे अपनी ठोस दलीलों से विरोधियों को लाजवाब करते रहे लेकिन जेटली के राजनीतिक करियर को सबसे बड़ी ऊंचाई 1999 में मिली, जब उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में राज्य मंत्री बनाया गया।बाद में उनका प्रमोशन हुआ और वे कैबिनेट मंत्री बने।

1999 से वाजपेयी सरकार में उन्होंने कानून और न्याय, शिपिंग, सूचना और प्रसारण, और वाणिज्य और उद्योग जैसे कई महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले। वाजपेयी सरकार जाने के बाद भी अरुण जेटली संसद में पार्टी की बुलंद आवाज बने रहे। दिलचस्प यह था कि जेटली को 2009 में राज्यसभा में विपक्ष का नेता भी बनाया गया था।

2014 में अरुण जेटली की बड़ी भूमिका

2014 के चुनाव में भाजपा की रणनीति तैयार करने में भी अरुण जेटली की बड़ी भूमिका रही। मोदी सरकार के शुरुआती पांच सालों में अरुण जेटली ने कई अहम जिम्मेदारियां संभालीं। उन्होंने अलग-अलग समय पर वित्त मंत्रालय, कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और सूचना व प्रसारण मंत्रालय का कार्यभार संभाला।

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24 अगस्त 2019 को हुआ था निधन

कई बार तो वे एक साथ कई मंत्रालयों की जिम्मेदारी भी संभालते थे। एक समय ऐसा भी था जब अरुण जेटली भारत के रक्षा, वित्त और कॉर्पोरेट मामलों के मंत्री थे। अरुण जेटली का 24 अगस्त 2019 को बीमारी के बाद निधन हो गया। वे 66 साल के थे।

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