CEC Gyanesh Kumar Controversy: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली और एसआईआर को लेकर हुए खुलासे के बाद से देश का सियासी मिजाज गर्म है। देश के कई हिस्सों में विपक्षी नेताओं ने प्रदर्शन कर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। इस बीच सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां के बयान ने विपक्ष की नेताओं के धार को और तेज कर दिया है। जस्टिस भुइयां ने कहा है कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया, जिसके तहत व्यापक पैमाने पर भारतीय नागरिकों को उनके वोट करने के अधिकार से दूर करती है, वो प्रक्रिया मनमानी है। इसके बाद बयानों की बारिश होने लगी है।
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां के टिप्पणी पर कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि वे हमारे सबसे सम्मानित और बेबाक लोगों में से एक हैं, जो बिना किसी डर या झिझक के अपनी बात रखते हैं। जस्टिस नरीमन एक ऐसे विषय पर बोल रहे थे जिसके शीर्षक में 'आम आदमी' शब्द शामिल था। जस्टिस भुइयां NALSAR यूनिवर्सिटी में युवाओं की एक सभा में बोल रहे थे।
उन दोनों ने वोट की अहमियत कम होने और वोट खत्म होने के बारे में बात की. लोकतंत्र में आम आदमी पर इससे ज्यादा असर किस चीज का हो सकता है? उन्होंने जो कहा, उसमें कुछ भी नया नहीं है। नई बात है उनका निडर होना, अपनी बात को स्पष्ट और बेबाकी से कहना।
नागरिकों के वोट देने के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की राय और जस्टिस नरीमन की टिप्पणियों पर कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने भी बयान दिया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा जज उज्ज्वल भुइयां और एक पूर्व जज ने कहा है कि संविधान के तहत हर व्यक्ति को वोट देने का अधिकार है। आज उसी अधिकार को कम किया जा रहा है; कांग्रेस इस मुद्दे को उठा रही है और जनता भी सड़कों पर यही चिंता जता रही है, फिर भी इन लोगों पर इसका कोई असर नहीं हो रहा है।
जस्टिस भुइयां के इस बयान को विपक्ष ने हाथों हाथ लिया. टीएमसी नेता महुआ मोइत्रा ने बयान देते हुए उनकी तारीफ सोशल मीडिया मंच एक्स पर की। उन्होंने कहा कि रिटायरमेंट के दिन जज का हिम्मत दिखाना आसान होता है. लेकिन जब कोई मौजूदा जज सत्ता के सामने सच बोलता है, तो यह एक मिसाल होती है. इसलिए जस्टिस भुइयां की तारीफ होनी चाहिए।
जज उज्ज्वल भुइयां ने कहा था कि यह उस संवैधानिक व्यवस्था को नकारने जैसा है जिसे हमने भारत के संविधान के आधार पर अपनाया है। भारतीय नागरिकों का वोट देने का अधिकार विदेशी शासन के खिलाफ भारत के लंबे संघर्ष से जुड़ा हुआ है. अनुच्छेद 326 में बिल्कुल भी कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। कोई भी अथॉरिटी ऐसा नहीं कर सकती। कोई भी अदालत इसे मंजूरी नहीं दे सकती या इसे सही नहीं ठहरा सकती। कोई भी संविधान से ऊपर नहीं है।