प्रधानमंत्री मोदी की स्पीच पर पी.चिदंबरम ने की प्रतिक्रिया डिजाइन फोटो
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दिमागी नक्सल पर सियासी घमासान, पीएम मोदी के बयान पर चिदंबरम का तीखा पलटवार

Independence Day Speech Controversy: पीएम मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण में 'दिमागी नक्सल' बयान पर बढ़ा विवाद। पी. चिदंबरम ने पलटवार कर कहा, 'मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व है।'

अनन्या तिवारी

P. Chidambaram Dimagi Naxal Controversy: देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए संबोधन ने देश की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में 'दिमागी नक्सल' शब्द का इस्तेमाल किया, जिस पर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने कड़ी आपत्ति जताई है। पूर्व गृह मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने तो इस पर पलटवार करते हुए यहां तक कह दिया कि उन्हें 'दिमागी नक्सल' होने पर गर्व है।

पीएम मोदी ने क्या कहा था?

शनिवार, 15 अगस्त को राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने नक्सलवाद के बदलते स्वरूप पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि 2014 के बाद सरकार की कड़ी कार्रवाई की वजह से जंगलों में चल रहे नक्सलवाद और उग्रवाद को काफी हद तक खत्म कर दिया गया है, जिसमें अब तक 3,500 से अधिक सुरक्षाकर्मी शहीद हुए हैं। हालांकि, पीएम ने चेतावनी दी कि भले ही जंगलों से नक्सली खत्म हो रहे हों, लेकिन 'दिमागी नक्सल' अब भी सक्रिय हैं और मौके की तलाश में हैं। उन्होंने देशवासियों से आग्रह किया कि वे ऐसी माओवादी मानसिकता वाले लोगों को पहचानें जो संस्थानों में बैठकर नीतियों को प्रभावित करते हैं और उन्हें समाज से अलग-थलग करें।

पी. चिदंबरम का 'गर्व' वाला बयान

प्रधानमंत्री के इस बयान के ठीक एक दिन बाद कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक बेहद छोटा लेकिन कड़ा संदेश पोस्ट किया। उन्होंने लिखा, "I am proud to be a dimagi naxal!" यानी मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व है। चिदंबरम का यह बयान सीधे तौर पर प्रधानमंत्री की उस टिप्पणी पर कटाक्ष था जिसमें उन्होंने वैचारिक विरोधियों को निशाना बनाया था।

जयराम रमेश ने बताया 'प्रधानमंत्री की हताशा'

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री को घेरा। उन्होंने कहा कि यह शब्द प्रधानमंत्री की हताशा को दर्शाता है। रमेश ने याद दिलाया कि दो-तीन साल पहले पीएम अपने विरोधियों को 'शहरी नक्सल' कहते थे, लेकिन जब संसद में इसकी परिभाषा पूछी गई, तो खुद गृह मंत्री अमित शाह को यह मानना पड़ा कि कानून में ऐसी कोई परिभाषा मौजूद ही नहीं है। रमेश ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार पहले अपने आलोचकों को बदनाम करती है और बाद में उन्हीं नीतियों को अपना लेती है जिनकी वे वकालत करते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पहले जाति जनगणना की मांग को 'शहरी नक्सली सोच' बताया गया था, लेकिन बाद में सरकार ने खुद इसकी घोषणा कर दी।

विपक्ष को 'राष्ट्र-विरोधी' बताने की कोशिश?

सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, CPM ने भी प्रधानमंत्री के इस संबोधन की निंदा की है। माकपा महासचिव एम ए बेबी ने कहा कि उनकी पार्टी नक्सलवाद और उनके हिंसक तरीकों का विरोध करती है, लेकिन 'दिमागी नक्सल' जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना केवल विपक्ष को निशाना बनाने और उन्हें 'राष्ट्र-विरोधी' घोषित करने का एक सुविधाजनक तरीका है। उन्होंने इसे बेहद आपत्तिजनक आरोप बताया।

इस पूरे विवाद ने एक बार फिर वैचारिक मतभेदों और राजनीतिक बयानबाजी के स्तर को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। जहां सत्ता पक्ष इसे देश की सुरक्षा और नीतिगत शुद्धता से जोड़ रहा है, वहीं विपक्ष इसे लोकतांत्रिक आवाजों को दबाने की कोशिश करार दे रहा है।

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