जेसीबी से रथ खींचने की नौबत।
जोगी विधान और काछन देवी की परंपरा पर उठे सवाल।
कांग्रेस ने भी सरकार पर लगाए कई गंभीर आरोप।
भीतर रैनी के दौरान विजय रथ की चपेट में आने से एक युवक की मौत।
Bastar Dussehra Controversy: 75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशहरा इस बार अपनी अनूठी परंपराओं और धार्मिक विधानों के साथ-साथ विवादों और व्यवस्थागत कमियों को लेकर भी चर्चा में रहा। कहीं विजय रथ की परिक्रमा में बाधा आने पर जेसीबी के इस्तेमाल की नौबत आई, तो कहीं जोगी विधान और काछन देवी की परंपरा को लेकर सवाल उठे। भीतर रैनी के दौरान विजय रथ की चपेट में आने से एक युवक की मौत और दूसरे के घायल होने की घटना ने आयोजन की व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के प्रवास के दौरान भी कुछ पारंपरिक रस्मों और उनसे जुड़े लोगों की भूमिका को लेकर विवाद सामने आए।
अब दशहरा संपन्न होने के बाद इन घटनाओं की समीक्षा शुरू हो गई है। कांग्रेस ने आयोजन में हुई कथित अव्यवस्थाओं और परंपराओं से छेड़छाड़ के आरोप लगाकर सरकार को घेरा है। वहीं, बस्तर दशहरा से जुड़े पारंपरिक पक्षों ने भी आयोजन की जिम्मेदारी स्थानीय लोगों को सौंपने और धार्मिक विधानों की जानकारी रखने वाले पुजारियों, मांझियों तथा चालकी को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करने की मांग उठाई है।
दशहरा आयोजन के दौरान फूल रथ की परिक्रमा में आई बाधा उस समय विवाद का कारण बन गई, जब रथ की मरम्मत और उसे आगे बढ़ाने के प्रयासों के बीच जेसीबी के इस्तेमाल की नौबत आई। पारंपरिक तरीके से रथ खींचने पहुंचे ग्रामीणों ने इस पर आपत्ति जताई। स्थिति बिगड़ने पर ग्रामीणों और पुलिस के बीच तनाव की स्थिति भी बनी। इस घटनाक्रम ने सवाल खड़ा किया कि सदियों पुरानी परंपरा से जुड़े इतने बड़े आयोजन में ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए पर्याप्त वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं थी।
इसके बाद भीतर रैनी के दौरान विजय रथ की चपेट में आने से युवक सन्नू की मौत और सुखराम मंडावी के घायल होने की घटना ने दशहरा की खुशियों को मातम में बदल दिया। हादसे के बाद सुरक्षा इंतजामों, रथ संचालन और जिम्मेदारी तय करने को लेकर सवाल उठे।
बस्तर दशहरा के दौरान विवाद केवल रथ तक सीमित नहीं रहे। नौ दिनों तक जोगी विधान करने वाले दौलत नाग और उनके परिवार की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि राष्ट्रपति के दौरे की तैयारियों के दौरान जोगी परिवार को सिरहासार भवन से हटाया गया, जिससे पारंपरिक विधान से जुड़े लोगों की भावनाएं आहत हुईं।
इसी तरह काछन देवी की परंपरा निभाने वाली बालिका को राष्ट्रपति से परिचित कराने के प्रसंग में भी विवाद सामने आया। पनका समाज की ओर से इस मामले में नाराजगी जताए जाने की बात सामने आई। इन घटनाओं ने यह बहस तेज कर दी कि राष्ट्रीय स्तर के अतिथियों के दौरे और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के बीच बस्तर की पारंपरिक धार्मिक भूमिकाओं और उनसे जुड़े समुदायों के सम्मान का ध्यान किस तरह रखा जाए।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने बस्तर दशहरा के दौरान सामने आए घटनाक्रमों को लेकर सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोजन में आदिवासी संस्कृति और परंपराओं का समुचित सम्मान नहीं किया गया। कांग्रेस ने जोगी विधान से जुड़े घटनाक्रम, काछन देवी की परंपरा और भीतर रैनी के दौरान हुए हादसे को उठाते हुए व्यवस्थाओं पर सवाल किए।
कांग्रेस ने रथ हादसे में मृत युवक के परिजनों को 50 लाख रुपये और घायल युवक को 25 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग भी की। पार्टी का कहना है कि बस्तर दशहरा को केवल सरकारी आयोजन या बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसकी पहचान उन पारंपरिक विधानों, स्थानीय समुदायों और धार्मिक व्यवस्थाओं से है, जो पीढ़ियों से इस पर्व को जीवित रखे हुए हैं।
बस्तर दशहरा की व्यवस्थाओं को लेकर अब स्थानीय स्तर पर भी समीक्षा की मांग उठी है। सुकमा जमींदार परिवार के कुमार जयदेव के नेतृत्व में बस्तर धाकड़ क्षत्रिय राजपूत समाज की ओर से आयोजित जोहारनी भेंट एवं दशहरा मिलन कार्यक्रम में इस वर्ष सामने आई कमियों और परेशानियों पर चर्चा की गई। इसमें दशहरा के धार्मिक विधानों से जुड़े पुजारी, मांझी-चालकी और गांव-गांव से देवी-देवताओं के साथ पहुंचे प्रतिनिधि शामिल हुए।
बस्तर धाकड़ क्षत्रिय राजपूत समाज के संरक्षक कुमार जयदेव ने कहा कि बस्तर दशहरा केवल प्रशासनिक आयोजन नहीं, बल्कि बस्तर की विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का पर्व है। सरकारी अधिकारी इसके धार्मिक महत्व और विभिन्न विधानों की बारीकियों से पूरी तरह परिचित नहीं होते। इसलिए आयोजन को केवल सरकारी कार्य के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।
उन्होंने मांग की कि बस्तर दशहरा के धार्मिक विधानों के संचालन के लिए विशेष समिति गठित की जाए। इसमें जगदलपुर और दंतेवाड़ा के पुजारियों, मांझियों और चालकी को शामिल कर आयोजन की जिम्मेदारी सौंपी जाए। उनके अनुसार, परंपराओं के जानकारों की भागीदारी से धार्मिक रस्मों की मर्यादा बनाए रखने और आयोजन की कमियों को दूर करने में मदद मिलेगी।
दंतेवाड़ा स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी परमेश्वर नाथ जिया ने भी जोहारनी भेंट कार्यक्रम में हुई चर्चा का उल्लेख करते हुए कहा कि कुमार जयदेव के नेतृत्व में आयोजित दशहरा मिलन कार्यक्रम में आपसी मेल-मुलाकात के साथ बस्तर दशहरा की कमियों और व्यवस्थाओं की समीक्षा की गई।
उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा बस्तर के लोगों का पर्व है और इसके आयोजन में स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। धार्मिक परंपराओं और विधानों की जानकारी रखने वाले लोगों को आयोजन की व्यवस्था में उचित जिम्मेदारी मिलनी चाहिए।
जिया की यह प्रतिक्रिया दशहरा आयोजन में स्थानीय समाज की भूमिका बढ़ाने की मांग को सामने लाती है। कुमार जयदेव और परमेश्वर नाथ जिया की बातों का केंद्रीय संदेश यही है कि धार्मिक विधानों की जिम्मेदारी ऐसे लोगों को मिले, जो इन परंपराओं को जानते हैं और पीढ़ियों से इनके निर्वहन से जुड़े हुए हैं।
इस वर्ष के घटनाक्रम ने बस्तर दशहरा की व्यवस्थाओं को लेकर कई सवाल छोड़ दिए हैं। रथ संचालन के दौरान आने वाली बाधाओं से निपटने की तैयारी, हादसे के बाद सुरक्षा और जवाबदेही, जोगी विधान की व्यवस्था, काछन देवी की परंपरा का सम्मान तथा मुरिया दरबार जैसे ऐतिहासिक आयोजन में स्थानीय समाज की भागीदारी,इन सभी विषयों पर अब चर्चा की जरूरत है।
एक ओर कांग्रेस इन घटनाओं को लेकर सरकार को घेर रही है, तो दूसरी ओर दशहरा से जुड़े पारंपरिक पक्ष आयोजन की व्यवस्था में स्थानीय लोगों को अधिक प्रभावी भूमिका देने की मांग कर रहे हैं। विशेष समिति गठित करने का प्रस्ताव इसी बहस का अहम हिस्सा है।
बस्तर दशहरा की पहचान उसकी भव्यता से जरूर है, लेकिन उसकी आत्मा उन धार्मिक विधानों, देवी-देवताओं, पुजारियों, मांझी-चालकी और समुदायों में बसती है, जो सदियों से इस परंपरा को आगे बढ़ाते आए हैं। अब देखना होगा कि आगामी आयोजन में इन मांगों पर कितना अमल होता है और प्रशासनिक व्यवस्था तथा पारंपरिक अधिकारों के बीच बेहतर तालमेल बनाने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।