

जनसहयोग से मंदिर और कुआं बनवाया।
तीन पीढ़ियों से जारी है पूजा-अर्चना।
त्रेता युग से जुड़ी मान्यता के बीच संरक्षण और सुविधाओं की जरूरत।
1961 में मधुर गिरी गोस्वामी ने जंगल के बीच शुरू किया विकास।
Rajim Lomesh Rishi Ashram Untold Story: राजिम स्थित महर्षि लोमश ऋषि आश्रम का वर्तमान स्वरूप वर्ष 1961 के बाद हुए विकास कार्यों का परिणाम है। यह जानकारी गोकुल गिरी महाराज ने दी। स्थानीय जानकारी के अनुसार, स्व. मधुर गिरी गोस्वामी महाराज जब यहां पहुंचे, तब आश्रम क्षेत्र घने जंगल से घिरा हुआ था और पूजा-अर्चना, आवागमन तथा श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। उन्होंने जनसहयोग से मंदिर और कुआं बनवाया, परिसर को व्यवस्थित किया और नियमित साधना-पूजा की परंपरा को मजबूत किया। आज यह स्थान त्रेता युग से जुड़ी धार्मिक मान्यता, ऋषि-परंपरा और तीन पीढ़ियों से चली आ रही पूजा-अर्चना के कारण राजिम का महत्वपूर्ण आस्था केंद्र माना जाता है।
मधुर गिरी महाराज के आगमन के समय यह क्षेत्र एकांत और प्राकृतिक वातावरण वाला स्थान था। जंगल के बीच स्थित होने के कारण यहां पहुंचना आसान नहीं था। परिसर में बेल, अकोल और अन्य वनस्पतियों के पेड़-पौधे फैले हुए थे। उन्होंने सबसे पहले परिसर की साफ-सफाई और व्यवस्था पर ध्यान दिया। धीरे-धीरे रहने, पूजा करने और श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए आवश्यक स्थान तैयार किए गए।
महाराज ने आश्रम परिसर में बाग-बगीचे विकसित किए और विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे लगाए। इससे क्षेत्र का प्राकृतिक सौंदर्य भी बढ़ा और आश्रम का वातावरण साधना के अनुकूल बना। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं के सहयोग से मंदिर का निर्माण कराया गया। पानी की आवश्यकता को देखते हुए कुआं भी बनवाया गया। उस समय जंगल क्षेत्र में कुएं का निर्माण आश्रम के लिए बड़ी सुविधा माना जाता था। मधुर गिरी महाराज ने निर्माण कार्यों के साथ आश्रम में नियमित पूजा, धार्मिक अनुष्ठान और साधना की परंपरा को भी मजबूत किया। उनके प्रयासों से जंगल के बीच स्थित यह साधना स्थल धीरे-धीरे स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र बनता गया और व्यवस्थित आश्रम का रूप ले लिया।
स्थानीय जानकारी के अनुसार, आश्रम में तीन पीढ़ियों से पूजा-अर्चना की परंपरा जारी है। परिवारों और श्रद्धालुओं ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस स्थान से अपना संबंध बनाए रखा है। नियमित पूजा, धार्मिक अनुष्ठान और विशेष अवसरों पर होने वाले कार्यक्रमों में स्थानीय लोगों की भागीदारी आज भी देखी जाती है।
वर्तमान में आश्रम गोकुल गिरी महाराज की देखरेख में है। वे आश्रम की धार्मिक व्यवस्था को निरंतर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। नियमित पूजा-अर्चना, आरती, धार्मिक अनुष्ठानों और श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन का दायित्व भी उनके द्वारा निभाया जाता है। आश्रम की परंपराओं, पूजा-विधि और धार्मिक अनुशासन को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में उनकी भूमिका अहम है।
तीन पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आश्रम के सामाजिक और धार्मिक महत्व को दर्शाती है। बुजुर्गों से मिली जानकारी नई पीढ़ी तक पहुंचती रही है और इसी माध्यम से आश्रम से जुड़ी अनेक स्मृतियां सुरक्षित हैं। मंदिर, कुआं, पेड़-पौधे और परिसर की संरचना मधुर गिरी महाराज के प्रयासों की याद दिलाते हैं।
स्थानीय लोग आश्रम को महर्षि लोमश की तपोभूमि से जोड़कर देखते हैं। मान्यता है कि महर्षि लोमश ने यहां तपस्या की थी और इस स्थान पर प्राचीन काल से साधना तथा धार्मिक गतिविधियां होती रही होंगी। इसी आस्था के कारण श्रद्धालु आश्रम को सामान्य धार्मिक स्थल के बजाय पवित्र तपोभूमि के रूप में देखते हैं।
महर्षि लोमश का उल्लेख शिवपुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, पद्मपुराण, महाभारत के वनपर्व और रामचरितमानस सहित विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। धार्मिक परंपरा में उन्हें कल्पांतजीवी, तपस्वी और ब्रह्मज्ञान से संपन्न ऋषि के रूप में स्मरण किया जाता है। उनके जीवन से जुड़े प्रसंग त्याग, वैराग्य, धर्म, भक्ति और लोककल्याण का संदेश देते हैं।
ब्रह्मवैवर्त पुराण में महर्षि लोमश और देवराज इंद्र से जुड़ी कथा का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि महर्षि ने इंद्र को समझाया था कि ऐश्वर्य और सत्ता स्थायी नहीं होते। महाभारत के वनपर्व में वे पांडवों को तीर्थों का महात्म्य बताते हैं। रामचरितमानस के उत्तरकांड में काकभुशुण्डि से संबंधित प्रसंग में भी उनका उल्लेख मिलता है।
धार्मिक परंपराओं में महर्षि लोमश को अगम अखाड़े का प्रवर्तक, भूगर्भ विज्ञान और लक्षण शास्त्र का प्रणेता भी माना गया है। उनके नाम से लोमश रामायण और लोमशी शिक्षा का उल्लेख मिलता है। फलित ज्योतिष से संबंधित साठ हजार श्लोकों वाली लोमश संहिता का भी धार्मिक साहित्य में उल्लेख किया जाता है।
हालांकि, धार्मिक मान्यता और ऐतिहासिक तथ्य के बीच अंतर को समझना आवश्यक है। आश्रम की त्रेता युग से जुड़ी पहचान मुख्य रूप से स्थानीय परंपरा और धार्मिक विश्वास पर आधारित है। वहीं, वर्तमान आश्रम के विकास का इतिहास आधुनिक काल से जुड़ा है, जिसमें मधुर गिरी गोस्वामी महाराज की भूमिका प्रमुख रही। इस स्थल की प्राचीनता और ऐतिहासिक निरंतरता को प्रमाणित करने के लिए पुराने दस्तावेजों, शिलालेखों, धार्मिक अभिलेखों और स्थानीय परंपराओं का विस्तृत अध्ययन जरूरी है।
Story by - Vinod Jain