डोनाल्ड ट्रंप, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
US Supreme Court On Trump Tariff: संयुक्त राज्य अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लागू किए गए विवादास्पद ‘रेसिप्रोकल टैरिफ’ पर अपना फैसला एक बार फिर सुरक्षित रख लिया है।
यह लगातार दूसरी बार है जब अदालत ने इस महत्वपूर्ण आर्थिक मामले पर निर्णय को आगे बढ़ा दिया है। इससे पहले 9 जनवरी को भी कोर्ट ने फैसला टाल दिया था और अब 14 जनवरी की सुनवाई में भी अगली तारीख को लेकर कोई बात नहीं बताई गई है।
यह पूरा मामला राष्ट्रपति ट्रंप की उस नीति से जुड़ा है, जिसके तहत उन्होंने अमेरिका के लगभग सभी बड़े व्यापारिक साझेदारों पर 10% से लेकर 50% तक के टैरिफ (आयात शुल्क) एकतरफा रूप से लगा दिए थे। इन शुल्कों को सही ठहराने के लिए ट्रंप प्रशासन ने 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) का इस्तेमाल किया। ट्रंप का तर्क है कि भारी व्यापार घाटा और फेंटेनाइल जैसे अवैध नशीले पदार्थों की तस्करी एक ‘राष्ट्रीय आपातकाल’ है, जिससे निपटने के लिए ये टैरिफ जरूरी हैं।
ट्रंप के इस कदम को 12 डेमोक्रेट-शासित अमेरिकी राज्यों के कारोबारियों ने चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि IEEPA कानून का मकसद केवल वास्तविक आपातकालीन स्थितियों से निपटना था, न कि राष्ट्रपति को देश की पूरी व्यापार नीति बदलने का अधिकार देना। उनका मुख्य तर्क यह है कि टैरिफ और व्यापारिक शुल्क तय करने का संवैधानिक अधिकार मुख्य रूप से अमेरिकी कांग्रेस (संसद) के पास है, न कि राष्ट्रपति के पास।
विशेषज्ञों और स्वयं राष्ट्रपति ट्रंप के अनुसार, इस फैसले का परिणाम अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए बहुत बड़ा होगा। यदि सुप्रीम कोर्ट इन टैरिफों को अवैध घोषित कर देता है तो अमेरिकी सरकार को अब तक वसूली गई करीब 130 से 150 अरब डॉलर की ड्यूटी (कर) व्यापारियों को वापस लौटानी पड़ सकती है। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर पहले ही चेतावनी दी है कि यदि सरकार यह केस हारती है, तो यह एक ‘आर्थिक आपदा’ के समान होगा।
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इससे पहले निचली फेडरल अदालतें ट्रंप सरकार के कई टैरिफ को अवैध करार दे चुकी हैं। नवंबर 2025 में हुई मौखिक सुनवाई के दौरान भी जजों ने राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियों के इस विस्तार को लेकर संशय व्यक्त किया था। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट द्वारा फैसला टालने से व्यापारिक जगत में अनिश्चितता और बढ़ गई है।