ईरान-इजरायल युद्ध का तेल बाजार पर असर (सोर्स-सोशल मीडिया)
Global Energy Market Crisis: पश्चिम एशिया में छिड़ी भीषण जंग ने अब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिलाकर रख दिया है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में एक बहुत बड़ा उछाल देखने को मिल रहा है। इस अनिश्चितता के दौर में दुनिया भर के निवेशक और आम लोग अब बढ़ती महंगाई और सप्लाई रुकने के डर से सहमे हुए हैं। लेकिन इस संकट के बीच कुछ बड़ी तेल कंपनियों के लिए भारी मुनाफे और निवेश के नए रास्ते भी खुलते नजर आ रहे हैं।
शनिवार को ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में अचानक बहुत तेज हलचल और हड़कंप मच गया है। मंगलवार को ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत कुछ समय के लिए 85 डॉलर प्रति बैरल के ऊंचे स्तर को पार कर गई। दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल की सप्लाई करने वाला होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से कीमतों में यह बढ़त देखी गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब भी दुनिया में कोई भू-राजनीतिक संकट आता है, तो तेल कंपनियों की कमाई काफी बढ़ जाती है। साल 2022 के रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी एक्सॉनमोबिल और शेवरॉन जैसी कंपनियों ने मिलकर 30 अरब डॉलर से ज्यादा कमाए थे। मौजूदा हालात में कतर द्वारा एलएनजी उत्पादन रोकने और सप्लाई रुकने से अमेरिकी रिफाइनर्स का मुनाफा बढ़ना पूरी तरह तय है।
कंपनियां नए कुओं को खोदने या बड़े प्रोजेक्ट्स में निवेश तभी करती हैं जब उन्हें लंबे समय तक ऊंची कीमतों का भरोसा मिले। डैन पिकरिंग के अनुसार अगर यह सप्लाई संकट लंबे समय तक चला तो कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर तक भी जा सकते हैं। फिलहाल कंपनियां उन क्षेत्रों में निवेश कर रही हैं जहां पर्मियन बेसिन की तरह बहुत ही जल्दी नतीजे और लाभ मिल सकते हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि उनकी नौसेना तेल टैंकरों का इस्तेमाल करेगी और शिपिंग को जरूरी बीमा भी देगी। इस घोषणा के तुरंत बाद बाजार में थोड़ा सुधार दिखा और तेल की कीमतों में बहुत मामूली सी गिरावट दर्ज की गई। अगर अमेरिका और चीन जैसे देश अपने आपातकालीन तेल भंडार खोलते हैं, तो कच्चे तेल की कीमतें और ज्यादा कम हो सकती हैं।
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भारत जैसे विकासशील देश भी इस संकट पर पैनी नजर रख रहे हैं क्योंकि तेल आयात उनकी अर्थव्यवस्था की मुख्य रीढ़ है। राहत की बात यह है कि भारत के पास वर्तमान में लगभग 25 दिनों का कच्चे तेल और गैस का रणनीतिक भंडार सुरक्षित है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह युद्ध जितना लंबा खिंचेगा, वैश्विक बाजार में अनिश्चितता और सप्लाई की बाधाएं उतनी ही अधिक बढ़ती जाएंगी।