तारिक रहमान का शपथ ग्रहण समारोह, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
Tarique Rahman PM Bangladesh: बांग्लादेश की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत तो हुई है लेकिन यह शांति के बजाय भारी टकराव के संकेतों के साथ आई है। रिपोर्ट के अनुसार, तारिक रहमान ने प्रधानमंत्री पद की कमान संभालते ही उन्हें न सिर्फ विपक्ष बल्कि अपनी सहयोगी दलों की कड़ी नाराजगी और विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने तारिक रहमान को संसद भवन में आयोजित एक समारोह में प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई। उनके साथ 13 अन्य कैबिनेट मंत्रियों ने भी शपथ ली है। हालांकि, विवाद तब शुरू हुआ जब BNP के सांसदों ने ‘कॉन्स्टिट्यूशन रिफॉर्म काउंसिल’ (संविधान सुधार परिषद) के सदस्य के रूप में शपथ लेने से साफ इनकार कर दिया। BNP का तर्क है कि इस परिषद के नियम अभी मौजूदा संविधान का हिस्सा नहीं हैं और इन पर संसद में गहन विचार-विमर्श की जरूरत है।
दरअसल, हालिया चुनाव के साथ ही मतदाताओं ने ‘जुलाई चार्टर’ पर एक जनमत संग्रह में भी भाग लिया था जिसे करीब 62 प्रतिशत जनता का समर्थन मिला। इस चार्टर का मुख्य उद्देश्य संसद को एक सीमित अवधि के लिए संविधान संशोधन के विशेष अधिकार देना है। यद्यपि BNP ने शुरुआत में इस चार्टर पर हस्ताक्षर किए थे लेकिन अब पार्टी का कहना है कि यह चार्टर तैयार करते समय उनसे सलाह नहीं ली गई थी और वे इसके कई प्रावधानों से असहमत हैं।
विपक्षी दल जमात-ए-इस्लामी और नेशनल सिटिजन्स पार्टी (NCP) इस मुद्दे पर आर-पार के मूड में हैं। जमात के नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि BNP सरकार जुलाई चार्टर को नहीं अपनाती है तो देशभर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू किए जाएंगे। जमात के महासचिव मिया गोलम पोरवार ने चुनावी अनियमितताओं और हिंसा का आरोप लगाते हुए इसे तानाशाही प्रवृत्ति करार दिया है। लंबी खींचतान के बाद जमात और NCP के सांसदों ने तो संसद और संविधान सभा दोनों की शपथ ले ली लेकिन BNP अपनी जिद पर अड़ी रही।
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बांग्लादेश की सड़कों पर एक बार फिर आंदोलन की आहट सुनाई दे रही है। दिलचस्प बात यह है कि जिस ‘फासीवाद’ शब्द का इस्तेमाल पहले शेख हसीना के खिलाफ किया गया था अब वही शब्द BNP नेतृत्व के खिलाफ भी इस्तेमाल होने लगा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शपथ विवाद और संवैधानिक सुधार को लेकर यह मतभेद आने वाले दिनों में बांग्लादेश की राजनीति को और अधिक अस्थिर कर सकते हैं।