विश्वयुद्ध की आहट (सोर्स-सोशल मीडिया)
World War 3 Signs Installments: साल 2026 की शुरुआत के साथ ही वैश्विक राजनीति एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर खड़ी है जहां शांति की बातें बेमानी होती जा रही हैं। ताकतवर देशों के नेतृत्व अब कूटनीति के बजाय सैन्य विकल्पों और ‘प्री-एम्प्टिव अटैक’ जैसी धमकियों को ही एकमात्र समाधान मान रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप का आक्रामक ‘डिपार्टमेंट ऑफ वॉर’ हो या पुतिन की नाटो के साथ अंतहीन रस्साकशी, हर तरफ युद्ध को सामान्य बनाया जा रहा है।
संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए शक्तिशाली राष्ट्र अब छोटे देशों के अस्तित्व को मोलभाव की वस्तु समझने लगे हैं। आइये जानते हैं कि कैसे दुनिया किश्तों में एक महाविनाशकारी तीसरे विश्वयुद्ध की ओर बढ़ रही है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इस बढ़ते खतरे के सामने पूरी तरह बेबस नजर आ रही हैं।
वेनेजुएला ऑपरेशन के बाद डोनाल्ड ट्रंप के पुराने बयानों को अब दुनिया गंभीरता से ले रही है क्योंकि वे किसी सनक का हिस्सा नहीं बल्कि एक सुविचारित रणनीति हैं। ट्रंप ने अमेरिकी रक्षा विभाग का नाम बदलकर ‘डिपार्टमेंट ऑफ वॉर’ रख दिया है, जो उनकी ऑफेंसिव मानसिकता का प्रतीक है। ग्रीनलैंड को खरीदने की बात हो या मेक्सिको और पनामा को दी गई धमकियां, ट्रंप की नजर में राष्ट्रों की सीमाएं अब कोई स्थाई महत्व नहीं रखतीं।
पश्चिमी गोलार्द्ध पर अमेरिकी एकाधिकार की बात करना दूसरे विश्वयुद्ध से पहले के जर्मनी की याद दिलाता है जिसने यूरोप में अपना ‘नेचुरल राइट’ घोषित किया था। हाल ही में नाइजीरिया पर हुआ हमला और ईरान को सैन्य कार्रवाई की चेतावनी यह बताती है कि अमेरिका अब रक्षात्मक रुख पूरी तरह त्याग चुका है। संप्रभुता के सम्मान के बजाय ट्रंप प्रशासन अब संसाधनों और रणनीतिक बढ़त के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार दिख रहा है।
चीन लगातार ताइवान के एकीकरण की बात दोहरा रहा है और इसके लिए उसने सैन्य बल के प्रयोग को अपना अंतिम हथियार घोषित किया है। पिछले पखवाड़े से ताइवान के आसपास जारी चीनी सैन्य अभ्यास ने पूरे क्षेत्र को एक युद्ध क्षेत्र में तब्दील कर दिया है। चीन केवल ताइवान ही नहीं बल्कि दक्षिण चीन सागर में जापान और अन्य पड़ोसी देशों के साथ भी टकराव की स्थिति बना रहा है।
भारत के प्रति भी चीन की मंशा कभी स्पष्ट नहीं रही और अरुणाचल प्रदेश से लेकर हिमालयी सीमाओं तक वह लगातार भारत के धैर्य की परीक्षा ले रहा है। चीन की असली तैयारी न केवल अपने पड़ोसियों को दबाने की है बल्कि वह अमेरिका के साथ सीधे महाशक्ति के संघर्ष के लिए खुद को तैयार कर रहा है। दोनों देशों के बीच की महत्वाकांक्षी नेतृत्व क्षमता किसी भी छोटे चिंगारी को बड़ी आग में बदलने के लिए पर्याप्त है।
रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध अब चार साल का सफर तय कर चुका है लेकिन शांति की कोई उम्मीद नजर नहीं आती। रूस का तर्क है कि वह केवल अपनी सुरक्षा और नाटो के विस्तार को रोकने के लिए मजबूरन इस संघर्ष में उतरा है। इस युद्ध ने पूरी दुनिया को दो स्पष्ट खेमों में बांट दिया है जहां पोलैंड और फिनलैंड जैसे देश अब सीधे तौर पर रूस के खतरे को महसूस कर रहे हैं।
यूरोप के लिए व्लादिमीर पुतिन अब एक ऐसे नेता बन चुके हैं जिन्हें केवल सैन्य शक्ति के माध्यम से ही रोका जा सकता है। विस्थापन और तबाही का यह दौर न केवल मानवीय संकट पैदा कर रहा है बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी अस्थिर कर चुका है। यूक्रेन का यह मोर्चा आने वाले समय में नाटो और रूस के बीच सीधे परमाणु टकराव का कारण भी बन सकता है।
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मिडिल-ईस्ट में इजरायल का अंतिम निशाना अब ईरान है जिसे वह अपनी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है। हमास और हिजबुल्लाह के ठिकानों को तबाह करने के बाद इजरायल अब सीरिया और ईरान की सैन्य ताकत को पूरी तरह ठिकाने लगाने की योजना पर काम कर रहा है। 2026 ईरान के लिए अशांति का वर्ष साबित हो रहा है जहां आंतरिक विद्रोह और बाहरी दबाव उसे घेरे हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान में अगर शासन परिवर्तन की कोशिश हुई तो वह वेनेजुएला की तरह शांतिपूर्ण नहीं होगी। इजरायल और अमेरिका दोनों ही ईरान को गिद्ध दृष्टि से देख रहे हैं और किसी भी क्षण वहां भीषण बमबारी शुरू हो सकती है। ईरान के तेल क्षेत्रों और परमाणु ठिकानों पर हमला होने की स्थिति में पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति ठप हो सकती है।
यमन का गृहयुद्ध अब एक नए और अधिक हिंसक चरण में प्रवेश कर गया है जहां सऊदी अरब के सब्र का बांध टूट चुका है। सऊदी प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अब यमन को केवल एक क्षेत्रीय समस्या नहीं बल्कि एक ‘बीमारी’ की तरह देख रहे हैं जिसे वे जड़ से मिटाना चाहते हैं। यमन के तेल समृद्ध इलाकों पर कब्जा करने की सऊदी अरब की मंशा ने क्षेत्रीय संघर्ष को और भड़का दिया है।
सऊदी अरब और UAE के बीच यमनी विद्रोही गुटों के समर्थन को लेकर आई दरार ने अरब जगत की एकता को भी कमजोर किया है। एक सप्ताह से जारी सऊदी की जमीनी और हवाई कार्रवाई ने यमन के मानवीय संकट को और बढ़ा दिया है। यह संघर्ष केवल दो देशों का नहीं बल्कि खाड़ी क्षेत्र के संसाधनों पर नियंत्रण की एक बड़ी जंग बनता जा रहा है।
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आज परमाणु हथियारों को शांति बनाए रखने का औजार नहीं बल्कि धमकी देने का एक प्रभावी माध्यम बना लिया गया है। ट्रंप द्वारा परमाणु परीक्षणों की बात करना और रूस-चीन द्वारा अपनी परमाणु क्षमताओं का प्रदर्शन करना यह बताता है कि विनाश की कोई सीमा नहीं है। पाकिस्तान जैसे देश भी अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए बार-बार परमाणु बटन का सहारा लेते हैं।
संयुक्त राष्ट्र और उसकी सुरक्षा परिषद अब केवल वीटो की राजनीति का अखाड़ा बनकर रह गई हैं जहां छोटे देशों की आवाज दब जाती है। अंतरराष्ट्रीय कानून अब केवल कमजोर देशों पर लागू होते हैं जबकि शक्तिशाली राष्ट्र अपनी सुविधानुसार उन्हें दरकिनार कर देते हैं। संस्थागत विफलता ही वह उपजाऊ जमीन है जिस पर विश्वयुद्ध का पौधा फलता-फूलता है।