सऊदी तुर्की संबंध, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
Middle East Power Struggle: मिडिल ईस्ट की राजनीतिक बिसात पर सऊदी अरब ने एक ऐसी चाल चली है जिसने न केवल क्षेत्र का शक्ति संतुलन बदल दिया है, बल्कि अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी तुर्किये को भी कई महत्वपूर्ण मोर्चों पर पीछे छोड़ दिया है। हालिया कूटनीतिक और सैन्य घटनाक्रमों से स्पष्ट होता है कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) के नेतृत्व में रियाद अब केवल एक तेल समृद्ध देश नहीं बल्कि एक अजेय सैन्य और कूटनीतिक शक्ति बनकर उभरा है। विशेषज्ञों के अनुसार, सऊदी अरब ने चार प्रमुख क्षेत्रों में ऐसी बढ़त बनाई है जिसका मुकाबला करना फिलहाल तुर्किये के लिए नामुमकिन नजर आ रहा है।
सऊदी अरब की सबसे बड़ी जीत पाकिस्तान के साथ हुआ उसका रणनीतिक समझौता है। सितंबर 2025 में हुए एक समझौते के बाद पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने यह सार्वजनिक कर दिया कि जरूरत पड़ने पर पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और क्राउन प्रिंस के बीच हुए इस करार ने सऊदी को एक ‘परमाणु छत्र’ प्रदान किया है, जबकि तुर्किये अब तक पाकिस्तान से ऐसी कोई सुरक्षा गारंटी हासिल करने में नाकाम रहा है।
सऊदी अरब अब केवल पश्चिमी देशों पर निर्भर नहीं है बल्कि उसने रूस के साथ भी अपने संबंधों को नया आयाम दिया है। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने हाल ही में सऊदी को मिडिल ईस्ट का सबसे अहम रणनीतिक साझेदार बताते हुए क्राउन प्रिंस के नेतृत्व की तारीफ की है। पिछले दो दशकों में किंग सलमान और राष्ट्रपति पुतिन के बीच जो भरोसे का रिश्ता बना है उसने सऊदी को वैश्विक स्तर पर एक संतुलित और स्वतंत्र खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर दिया है।
सैन्य आधुनिकिकरण की दौड़ में सऊदी अरब ने तुर्किये को बड़ा झटका दिया है। सऊदी अरब ने अमेरिका से 48 F-35 लड़ाकू विमान खरीदने की डील पक्की कर ली है जिन्हें दुनिया के सबसे उन्नत स्टील्थ फाइटर जेट्स माना जाता है। ये विमान रडार की पकड़ में आए बिना सटीक हमला करने में सक्षम हैं।
दिलचस्प बात यह है कि सऊदी अरब तुर्किये से भी ‘कान’ फाइटर जेट खरीदने की योजना बना रहा है। हालांकि, वाशिंगटन ने इस पर नाराजगी जताई है क्योंकि वह नहीं चाहता कि F-35 का इस्तेमाल करने वाला कोई मुल्क किसी दूसरे देश के फाइटर जेट का भी उपयोग करे।
क्षेत्रीय राजनीति में भी सऊदी अरब की सक्रियता ने तुर्किये और यूएई को रक्षात्मक मोड पर ला दिया है। यमन में सऊदी के भारी दबाव के कारण यूएई समर्थित ताकतों को पीछे हटना पड़ा है।
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वहीं, सूडान के संकट में सऊदी ने चतुराई से अमेरिका की एंट्री कराई जिससे वहां के हालात पर रियाद का प्रभाव बढ़ गया। हाल ही में अल्जीरिया ने भी यूएई के साथ अपने पुराने समझौतों को रद्द कर सऊदी अरब के साथ नई सुरक्षा डील पर बातचीत शुरू की है, जो मिडिल ईस्ट में बदलते शक्ति समीकरणों का बड़ा प्रमाण है।