ईरान में सरकार बदली…तो मालामाल हो जाएंगे पाक-चीन, भारत को क्या मिलेगा? जाने इनसाइड स्टोरी
Iran Crisis: ईरान में सत्ता परिवर्तन की आशंका से भारत की स्थिति कमजोर हो सकती है, जबकि चीन और पाकिस्तान को चाबहार, संतुलन और राजनीति में फायदा मिल सकता है।
- Written By: अक्षय साहू
ईरान में सत्ता परिवर्तन से भारत को घाटा (सोर्स- सोशल मीडिया)
Regime Change in Iran: ईरान में सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई का शासन इस समय गंभीर आंतरिक और बाहरी दबावों का सामना कर रहा है। देश के भीतर लगातार हो रहे विरोध-प्रदर्शन सरकार की वैधता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार सैन्य कार्रवाई की खुली धमकी दे रहे हैं। इसी बीच, करीब चार दशक से निर्वासन में रह रहे विपक्षी नेता रजा पहलवी की सक्रियता बढ़ी है। उनके संभावित ईरान लौटने के बयान ने नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं को और हवा दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान में अमेरिका समर्थित सरकार आती है तो इसका सबसे बड़ा झटका भारत को लग सकता है। भारत और ईरान वर्षों से रणनीतिक साझेदार रहे हैं, खासकर उस स्थिति में जब पाकिस्तान भारत को जमीनी रास्ते से पश्चिम एशिया तक पहुंचने से रोकता रहा है। ऐसे में ईरान भारत के लिए एक वैकल्पिक और भरोसेमंद मार्ग उपलब्ध कराता है।
चीन-पाकिस्तान रणनीतिक लाभ
चाबहार बंदरगाह भारत-ईरान सहयोग का सबसे अहम प्रतीक है, जिसे चीन और पाकिस्तान द्वारा विकसित ग्वादर पोर्ट के जवाब के रूप में देखा जाता है। इसके अलावा, सुन्नी बहुल पाकिस्तान जब इस्लामिक एकता की बात करता है, तब शिया ईरान एक संतुलनकारी भूमिका निभाता है, जो भारत के हित में रहा है। लेकिन यदि ईरान में अमेरिका समर्थक नेतृत्व आता है, तो यह संतुलन टूट सकता है और चीन व पाकिस्तान को रणनीतिक लाभ मिल सकता है।
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ट्रंप का पाकिस्तान के प्रति झुकाव खतरनाक
इसके अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का पाकिस्तान की ओर झुकाव भी भारत के लिए एक बड़ी समस्या खड़ा कर सकता है। माना जा रहा था कि अमेरिका सऊदी अरब और कतर में मौजूद अपने सैन्य एयरबेस से ईरान पर हमला बोल सकता है। लेकिन हाल ही में सऊदी अरब ने ईरान को यह भरोसा दिया है कि वो अपने हाई क्षेत्र का उपयोग उसके खिलाफ हमला करने में के लिए नहीं होने देगा। कतर का रुख भी कुछ ऐसा ही है।
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ऐसे में अमेरिका पाकिस्तान को ईरान पर हमले के लिए उपयोग कर सकता है। अगर ऐसा होता है तो एक बार फिर रूस अफगानिस्तान युद्ध (1979-1989) स्थिती देखने को मिल सकती है। जब अमेरिका ने पाकिस्तान में अपने बेस बनाकर रूस के खिलाफ अफगान लड़ाकों की मदद की थी और 2001 में वॉर ऑन टेरर चलाकर तालिबान पर हमला किया था। दोनों ही अभियानों के दौरान अमेरिका ने पाकिस्तान अपने सैन्य बेस बनाए थे और इसके लिए पाकिस्तान को अरबों डाॅलर दिए थे।
