US Iran वार्ता में पाकिस्तान मध्यस्थ नहीं, सिर्फ एक संदेशवाहक था; रिपोर्ट्स

Sino American Diplomacy: रिपोर्ट के अनुसार US Iran के बीच हालिया सीजफायर में पाकिस्तान ने मध्यस्थ की नहीं बल्कि संदेशवाहक की भूमिका निभाई है। असल में इसके पीछे चीन का ही बड़ा प्रभाव था।
Pakistan Acted As Courier Not Mediator In US Iran Talks Says Report 
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस(सोर्स-सोशल मीडिया)
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US Iran Ceasefire Agreement: अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए युद्धविराम में पाकिस्तान की भूमिका पर बड़े सवाल उठे हैं। दरअसल यह दावा किया गया है कि पाकिस्तान इस US Iran संघर्ष विराम समझौता में एक मध्यस्थ नहीं था। वह सिर्फ एक ऐसा माध्यम बना जिसके जरिए चीन और अमेरिका ने एक दूसरे तक अपनी अहम बातें पहुंचाईं। इस संपूर्ण कूटनीतिक शांति प्रक्रिया में असल कूटनीतिक खेल चीन जैसे शक्तिशाली देशों द्वारा ही खेला गया था।

मध्यस्थ नहीं संदेशवाहक

रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के पास कोई खास दबदबा या फिर कोई ठोस समाधान पेश करने की क्षमता बिल्कुल नहीं थी। वह दोनों पक्षों को किसी भी तरह के समझौते की ओर मजबूती से धकेलने की स्थिति में बिल्कुल भी नहीं था। वह सिर्फ एक कूटनीतिक रास्ता बना जिससे चीन जैसे देश बिना सामने आए अपने संदेश पहुंचा सकें।

आठ अप्रैल का सीजफायर

आठ अप्रैल को जब US Iran दो हफ्ते के सीजफायर पर सहमत हुए तो दुनिया ने काफी राहत महसूस की थी। US Iran के इस बड़े समझौते का पूरा श्रेय पाकिस्तान को मध्यस्थ के रूप में दिया गया जिससे उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि बढ़ गई। फील्ड मार्शल असीम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को दुनिया भर के बड़े नेताओं से कई बधाई संदेश मिले।

पर्दे के पीछे की कहानी

दिखावे के पीछे की यह कूटनीतिक कहानी असल में बहुत ही ज्यादा जटिल और चौंकाने वाली मानी जा रही है। पाकिस्तान ने इस पूरे मामले में किसी भी बड़े फैसले को तय करने वाली कोई मुख्य भूमिका नहीं निभाई थी। वह तो सिर्फ एक ऐसा माध्यम बना जिसके जरिए अमेरिका और चीन जैसे बड़े देश आपस में बातचीत कर सकें।

चीन और पाकिस्तान की योजना

पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार की बीजिंग यात्रा के कुछ ही दिनों बाद एक नई शांति योजना सामने आई। पश्चिम एशिया संघर्ष को लेकर चीन-पाकिस्तान की इस संयुक्त योजना के कई अहम हिस्से सीजफायर में साफ तौर पर दिखे। बाद में इस शांति योजना को वॉशिंगटन और तेहरान दोनों ने ही अपनी तरफ से पूरी तरह स्वीकार कर लिया।

संवेदनशील मुद्दों पर फोकस

इस नए प्रस्ताव में उन सभी मुद्दों से बचा गया जिनसे चीन को किसी भी तरह का कूटनीतिक नुकसान हो सकता था। इसमें विशेष रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र पर सबसे ज्यादा और खास ध्यान दिया गया था। वहीं दूसरी ओर बाकी सभी जटिल राजनीतिक मुद्दों को इस समझौते में जानबूझकर बहुत ही ज्यादा अस्पष्ट रखा गया।

डोनाल्ड ट्रंप की मजबूरी

रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए यह खुलकर मानना राजनीतिक रूप से काफी ज्यादा मुश्किल होता। अगर वह मानते कि चीन ने मदद की है तो यह संदेश जाता कि वह पूरी तरह से बीजिंग के प्रभाव पर निर्भर हैं। वहीं चीन के लिए भी खुलकर सामने आकर इस मामले में कोई बड़ी भूमिका निभाना बहुत ही ज्यादा जोखिम भरा काम था।

चीन का कूटनीतिक बचाव

बीजिंग आमतौर पर ऐसी हाई-प्रोफाइल कूटनीतिक भूमिकाओं से बचता है जहां असफलता उसकी छवि को काफी नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए पाकिस्तान ने इस खाली जगह को बहुत ही समझदारी से भरा और अमेरिका को एक सार्वजनिक साझेदार दिया। इसके साथ ही उसने चीन को एक ऐसा गुप्त चैनल दिया जिससे वह ईरान पर अपना गहरा प्रभाव आसानी से डाल सके।

अंतिम गारंटर चीन

इशाक डार की बीजिंग यात्रा में इस बात पर जरूर चर्चा हुई होगी कि समझौते के लिए चीन को कैसे शामिल किया जाए। पाकिस्तान ने यह बातचीत अमेरिका और चीन की किसी न किसी स्तर की सहमति के बिना बिल्कुल भी आगे नहीं बढ़ाई होगी। व्यवहार में देखा जाए तो ईरान किसी भी अंतिम समझौते में गारंटर के रूप में सिर्फ और सिर्फ चीन को ही देखेगा।

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