Bangladesh Elections 2026: बीएनपी ने 1971 के मुक्ति संग्राम का मुद्दा उठाकर जेआई को बुरी तरह हराया

Liberation War Echoes: बांग्लादेश चुनावों (Bangladesh Elections) में 1971 के मुक्ति संग्राम की यादों का गहरा असर दिखा। बीएनपी ने जेआई के खिलाफ इस ऐतिहासिक मुद्दे का इस्तेमाल करके शानदार जीत दर्ज की।
Bangladesh Elections 2026: BNP Uses 1971 Liberation War History To Defeat Jamaat-e-Islami Now
बांग्लादेशदेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान (सोर्स-सोशल मीडिया)
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Bangladesh Parliamentary Elections History: बांग्लादेश के हालिया चुनावों में राजनीतिक दलों ने मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए ऐतिहासिक यादों का जमकर इस्तेमाल किया। फरवरी में हुए इन महत्वपूर्ण चुनावों में बांग्लादेश के संसदीय चुनावों के इतिहास का एक बहुत ही नया और दिलचस्प रूप सामने आया। जिन मतदाताओं का 1971 के मुक्ति संग्राम से जुड़ाव था, उन्होंने मुक्ति युद्ध के मतदाताओं की भावना के आधार पर अपना मतदान किया। उन्होंने उन पार्टियों को अपना पूरा समर्थन दिया जो इस ऐतिहासिक आंदोलन की विरासत को आगे बढ़ाने की मजबूत वकालत करती हैं।

बीएनपी की नई चुनावी रणनीति

अखबार 'प्रथम आलो' के अनुसार 2026 के चुनावों (Bangladesh Elections) से पहले बीएनपी ने 1971 के मुक्ति संग्राम का जिक्र बढ़ा दिया था। बीएनपी ने जमात-ए-इस्लामी (जेआई) की उस समय की विवादित भूमिका पर जनता का ध्यान विशेष रूप से केंद्रित किया। अवामी लीग के न होने से जेआई मुख्य प्रतिद्वंद्वी बन गया, इसलिए बीएनपी ने चुनावी फायदे के लिए यह कदम उठाया।

जेआई के साथ पुराना गठबंधन

इतिहास गवाह है कि बीएनपी ने पहले कई चुनावों में जेआई के साथ गठबंधन किया और सरकारें भी बनाई थीं। जेआई ने बांग्लादेश की आजादी का खुलकर विरोध किया था, फिर भी राजनीतिक जरूरतों के कारण दोनों पार्टियां साथ थीं। हालांकि, बीएनपी नेताओं ने अब अपनी पुरानी राजनीतिक दोस्ती को सिर्फ एक मजबूरी बताकर अपना पूरा बचाव किया है।

प्रधानमंत्री तारिक रहमान का बयान

वरिष्ठ नेताओं ने चुनावी रैलियों (Bangladesh Elections) में जेआई की पुरानी और विवादित भूमिका पर कई बड़े सवाल उठाए। बीएनपी के नेता और प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने 22 जनवरी को सिलहट की एक विशाल रैली को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि आजादी की लड़ाई में कुछ लोगों ने देश का विरोध किया था और इतिहास कभी मिटाया नहीं जा सकता।

मिर्ज़ा फखरुल की तीखी आलोचना

इसके बाद 28 जनवरी को बीएनपी के महासचिव मिर्ज़ा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने भी जेआई की तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि इस पार्टी ने हमारे स्वतंत्रता संग्राम का विरोध किया और देश की आजादी में बिल्कुल विश्वास नहीं रखा। फखरुल ने जनता से सीधा सवाल पूछा कि क्या ऐसे लोगों पर देश चलाने का महत्वपूर्ण भरोसा कभी भी किया जा सकता है।

संवेदनशील वोटरों का झुकाव

यह पूरी रणनीति इसलिए अपनाई गई ताकि मुक्ति संग्राम की विरासत को लेकर संवेदनशील वोटरों को अपने पक्ष में किया जा सके। ये वे वोटर थे जो अवामी लीग की अनुपस्थिति में पहले अपना झुकाव किसी अन्य राजनीतिक पार्टी की तरफ भी रख सकते थे। बीएनपी ने खुद को मुक्ति संग्राम की रक्षा करने वाली एकमात्र देशभक्त पार्टी के रूप में जनता के सामने बहुत मजबूती से पेश किया।

12 फरवरी के चुनाव परिणाम

रिपोर्ट के मुताबिक 12 फरवरी के चुनाव (Bangladesh Elections) के नतीजों से पता चला कि भावनात्मक रूप से जुड़े वोटरों ने बीएनपी को चुना। यह मतदान सिर्फ चुनावी वादों के कारण नहीं बल्कि जेआई के सत्ता में आने के एक बड़े डर के कारण भी भारी संख्या में हुआ था। वोटरों को यह डर था कि अगर जेआई सत्ता में आई तो 1971 की आजादी की विरासत और अहम मूल्य बहुत ज्यादा कमजोर पड़ जाएंगे।

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