ईरान को हल्के में लेना ट्रंप को पड़ा भारी…मध्य पूर्व के 13 US बेस बुरी तरह क्षतिग्रस्त, खुलासे से हड़कंप
US-Iran War: अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी हमलों में मिडिल ईस्ट के 13 अमेरिकी सैन्य बेस 'रहने लायक' नहीं बचे हैं। कुवैत और कतर में भारी तबाही के बाद सैनिकों को होटलों में शरण लेनी पड़ी।
- Written By: अक्षय साहू
सांकेतिक तस्वीर
US-Iran Conflict: ईरान के ड्रोन और मिसाइल हमलों ने मिडिल ईस्ट में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया है। इसी बीच अमेरिकी अखबार दि न्यू यॉर्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में कुछ ऐसे दावे किए हैं जिसने अमेरिकी राजनीति में भूचाल ला दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, इन हमलों के बाद क्षेत्र में स्थित 13 अमेरिकी सैन्य बेस इतने क्षतिग्रस्त हो गए हैं कि वे लगभग रहने लायक नहीं बचे।
रिपोर्ट में कहा गया है कि अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद से ईरान लगातार जवाबी कार्रवाई कर रहा है। इस दौरान उसने मिडिल ईस्ट में अमेरिका और इजरायल से जुड़े सैन्य और ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाया। माना जा रहा है कि अमेरिका और इजरायल ने ईरान की प्रतिक्रिया की तीव्रता को कम आंका था, लेकिन तेहरान ने बड़े पैमाने पर मिसाइल और ड्रोन हमले कर हालात बदल दिए।
हमलों के कारण अमेरिकी ठिकाने तबाह
इन हमलों के कारण कई अमेरिकी ठिकाने “लगभग निर्जन” हो गए हैं। हालात ऐसे हो गए हैं कि सैनिकों को होटलों और अस्थायी कार्यालयों में शरण लेनी पड़ रही है। इससे अमेरिकी सेना को एक तरह से “रिमोट वॉर” की स्थिति में काम करना पड़ रहा है, जहां जमीनी संचालन सीमित हो गया है, जबकि हवाई अभियान जारी हैं।
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कुवैत को सबसे ज्यादा नुकसान
सबसे ज्यादा नुकसान कुवैत में स्थित अमेरिकी ठिकानों को हुआ है। यहां पोर्ट शुऐबा, अली अल सलेम एयर बेस और कैंप बुहरिंग जैसे प्रमुख सैन्य केंद्रों को गंभीर क्षति पहुंची है। इन ठिकानों पर ईरानी हमलों ने संचालन, विमान अवसंरचना और ईंधन प्रणालियों को बुरी तरह प्रभावित किया है।
युद्ध से खाड़ी देशों की हालात खराब
इसके अलावा कतर, बहरीन और सऊदी अरब में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर भी मिसाइल और ड्रोन हमले किए गए हैं। इन हमलों से न केवल सैन्य ढांचे को नुकसान हुआ है, बल्कि रसद व्यवस्था और सैनिकों की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं।
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कुल मिलाकर, ईरान की इस जवाबी कार्रवाई ने मिडिल ईस्ट में सैन्य संतुलन को हिला दिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि संघर्ष अब और जटिल और व्यापक रूप ले चुका है, जिसका असर आने वाले समय में क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा पर पड़ सकता है।
