राष्ट्रपति ट्रंप, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
Trump Kharg Island Plan: पश्चिम एशिया में युद्ध की ज्वाला भड़कती जा रही है। ताज़ा रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने ईरान के चारों ओर अपनी सैन्य मौजूदगी को खतरनाक स्तर तक बढ़ा दिया है। मिडिल-ईस्ट में अब अमेरिकी सैनिकों की संख्या 50,000 के पार पहुंच गई है, जो सामान्य दिनों की तुलना में लगभग 10,000 अधिक है। पेंटागन की इस भारी तैनाती ने संकेत दिया है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के खिलाफ किसी बड़े सैन्य ऑपरेशन का मन बना चुके हैं।
युद्ध के इस एक महीने के दौरान अमेरिकी लड़ाकू विमान ईरान के मुख्य तेल निर्यात केंद्र, खार्ग द्वीप सहित 90 से अधिक सैन्य ठिकानों पर बमबारी कर चुके हैं। खार्ग द्वीप ईरान की आर्थिक रीढ़ माना जाता है, और सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन इस द्वीप पर पूरी तरह कब्जा करने की योजना बना सकता है। यदि अमेरिका इस द्वीप को अपने नियंत्रण में लेता है तो ईरान की आर्थिक कमर पूरी तरह टूट सकती है, क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा यहीं से होने वाले तेल निर्यात पर टिका है।
दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा Strait of Hormuz से होकर गुजरता है। ईरान की ओर से किए गए हमलों के कारण यह मार्ग वर्तमान में काफी हद तक बाधित हो गया है। ट्रंप प्रशासन के लिए इस वैश्विक ऊर्जा मार्ग को सुरक्षित करना सर्वोच्च प्राथमिकता है। इस काम के लिए 31वीं मरीन एक्सपीडिशनरी यूनिट के सैनिकों को ‘स्टैंडबाय’ पर रखा गया है ताकि वे कठिन सामरिक ऑपरेशन्स को अंजाम देकर तेल की आपूर्ति बहाल कर सकें।
पेंटागन ने हाल ही में 82वीं एयरबोर्न डिवीज़न के 2,000 घातक पैराट्रूपर्स को मिडिल-ईस्ट भेजा है। हालांकि इनकी सटीक लोकेशन को गुप्त रखा गया है लेकिन माना जा रहा है कि इन्हें उत्तरी फारसी खाड़ी में खार्ग द्वीप जैसे रणनीतिक ठिकानों पर जमीन से हमला करने के लिए तैनात किया गया है।
दूसरी ओर, सैन्य विशेषज्ञ इस भारी जमावड़े के बावजूद चेतावनी दे रहे हैं। उनका मानना है कि ईरान जैसे भौगोलिक रूप से विशाल और सैन्य क्षमता संपन्न देश पर कब्जा करने के लिए 50,000 सैनिकों की संख्या पर्याप्त नहीं है। विशेषज्ञों को डर है कि अमेरिका कहीं वियतनाम या अफगानिस्तान की तरह किसी लंबी जमीनी जंग में न फंस जाए।
व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट के अनुसार, ये सभी तैयारियां राष्ट्रपति को अधिकतम विकल्प प्रदान करने के लिए की गई हैं। हालांकि पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र जैसे देश मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं लेकिन वाशिंगटन और तेहरान के बीच फिलहाल कोई सीधी बातचीत नहीं हो रही है। फिलहाल पूरी दुनिया की नज़रें ट्रंप के अगले कदम पर टिकी हैं जो वैश्विक बाज़ार और शांति की दिशा तय करेगा।