जर्मनी बना रहा सबसे मजबूत सेना, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
Donald Trump Greenland Plan: जनवरी 2026 का महीना वैश्विक राजनीति में एक बड़े बदलाव का गवाह बन रहा है। NATO के भीतर एक अभूतपूर्व दरार पैदा हो गई है जहां अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगी देश अब आमने-सामने हैं।
इस विवाद की जड़ में ग्रीनलैंड है जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खरीदने की अपनी पुरानी मांग पर अड़े हुए हैं। डेनमार्क द्वारा इस प्रस्ताव को ठुकराए जाने के बाद अमेरिका ने जर्मनी और फ्रांस सहित 8 यूरोपीय देशों पर 10% टैरिफ लगाने का ऐलान किया है जो 1 फरवरी 2026 से लागू हो सकता है।
अमेरिका के इस ‘कठोर व्यापारी’ वाले व्यवहार और रूस के खतरे को देखते हुए जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने घोषणा की है कि उनका देश अब ‘यूरोप की सबसे मजबूत पारंपरिक सेना’ खड़ा करेगा। जर्मनी अब वाशिंगटन का ‘जूनियर पार्टनर’ बनकर रहने को तैयार नहीं है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए जर्मनी में 18 वर्ष के पुरुषों के लिए सैन्य सेवा से संबंधित अनिवार्य प्रश्नपत्र भरना अब कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया गया है।
यूरोपीय देशों ने अमेरिकी दबाव के आगे झुकने के बजाय ‘ऑपरेशन आर्कटिक एनड्योरेंस’ शुरू किया है। इतिहास में पहली बार, जर्मनी, फ्रांस और स्वीडन की सेनाएं ग्रीनलैंड में डेनमार्क की मदद के लिए तैनात हो रही हैं। यह कदम सीधे तौर पर अमेरिकी हितों के खिलाफ है और नाटो के भीतर एक गहरी सैन्य दरार को दर्शाता है।
जर्मनी में अब अमेरिका को लेकर धारणा तेजी से बदली है। एक ताज़ा सर्वे के अनुसार, 84% जर्मन नागरिकों का मानना है कि अमेरिका अब यूरोप की सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकता। इसके अलावा, 75% लोग अब अमेरिकी परमाणु सुरक्षा के बजाय एंग्लो-फ्रेंच परमाणु ढांचे पर भरोसा करने के पक्ष में हैं।
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जर्मनी ने 2035 तक अपने सक्रिय सैनिकों की संख्या 2.6 लाख और रिजर्व सैनिकों की संख्या 2 लाख तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। वर्तमान में जर्मनी का रक्षा बजट 108 अरब यूरो है, जिसे 2030 तक जीडीपी का 3.5% करने की योजना है। रूस ने जर्मनी की इन तैयारियों पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे सीधे सैन्य टकराव की तैयारी करार दिया है।