डेनमार्क चुनाव: ग्रीनलैंड पर ट्रंप से तकरार के बाद क्या फिर पीएम बनेंगी फ्रेडरिक्सन? जानें क्या हैं बड़े मुद्दे
Denmark Election: डेनमार्क में आज नई संसद के लिए मतदान हो रहा है। ग्रीनलैंड संकट के बीच प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन अपनी तीसरी पारी के लिए मैदान में हैं। हालांकि इस बार कई चुनौतियां भी मौजूद है।
- Written By: अमन उपाध्याय
डेनमार्क चुनाव, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
Trump Greenland Denmark Issue: स्कैंडिनेवियाई देश डेनमार्क में आज, मंगलवार 24 मार्च 2026 को नई संसद के चुनाव के लिए मतदान की प्रक्रिया शुरू हो गई है। वर्तमान प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन इस चुनाव के माध्यम से लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही हैं।
डेनमार्क में यह चुनाव अपने निर्धारित समय से कई महीने पहले आयोजित किए जा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री ने यह कदम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ ग्रीनलैंड के भविष्य को लेकर हुए कूटनीतिक विवाद के बाद अपनी छवि को भुनाने के लिए उठाया है।
ग्रीनलैंड संकट और ट्रंप से तकरार
प्रधानमंत्री फ्रेडरिक्सन ने फरवरी में ही चुनाव का आह्वान कर दिया था। इसके पीछे की मुख्य वजह ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका के साथ पैदा हुआ तनाव था जब राष्ट्रपति ट्रंप ने इस अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र पर अमेरिकी नियंत्रण की इच्छा जताई थी। फ्रेडरिक्सन ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया जिससे उनकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत नेता के रूप में पहचान बनी। हालांकि अब अमेरिका और डेनमार्क के बीच रिश्तों में जमी बर्फ कुछ पिघली है और दोनों पक्ष आर्कटिक सुरक्षा को लेकर तकनीकी बातचीत कर रहे हैं लेकिन चुनावी मैदान में यह मुद्दा अब भी चर्चा में है।
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महंगाई और प्रवासन
भले ही अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर फ्रेडरिक्सन ने बढ़त बनाई हो लेकिन घरेलू मोर्चे पर उन्हें कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उनके दूसरे कार्यकाल के दौरान डेनमार्क में जीवन यापन की लागत काफी बढ़ गई है जिससे आम नागरिकों की जेब पर भारी बोझ पड़ा है। चुनाव प्रचार के दौरान विपक्षी दलों ने पेंशन योजनाओं और प्रस्तावित संपत्ति कर जैसे मुद्दों पर सरकार को जमकर घेरा है।
इसके साथ ही, प्रवासन की नीति इस चुनाव का एक बेहद संवेदनशील हिस्सा रही है। पीएम फ्रेडरिक्सन ने ईरान युद्ध के कारण यूरोप में शरणार्थियों की नई लहर आने की आशंका जताई है। इसे देखते हुए उनकी सरकार ने शरण चाहने वालों पर ‘इमरजेंसी ब्रेक’ लगाने और गंभीर अपराधों में शामिल विदेशियों को तत्काल निर्वासित करने जैसे सख्त कानूनों का प्रस्ताव रखा है।
गठबंधन की राजनीति और मुख्य प्रतिद्वंद्वी
डेनमार्क की 179 सीटों वाली संसद के लिए लगभग 4.3 मिलियन मतदाता अपने मताधिकार का उपयोग कर रहे हैं। यहां की आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के कारण किसी एक दल के लिए स्पष्ट बहुमत हासिल करना बहुत कठिन होता है जिसके चलते चुनाव के बाद अक्सर गठबंधन बनाने के लिए लंबी बातचीत चलती है।
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फ्रेडरिक्सन को उनके ही मंत्रिमंडल के रक्षा मंत्री ट्रोएल्स लुंड पॉल्सन और लिबरल अलायंस के युवा नेता एलेक्स वैनोपस्लाघ से कड़ी टक्कर मिल रही है। वैनोपस्लाघ कम टैक्स और परमाणु ऊर्जा के समर्थक हैं हालांकि उनके अतीत से जुड़े कुछ विवाद उनकी लोकप्रियता के आड़े आ सकते हैं। इस त्रिकोणीय मुकाबले में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या फ्रेडरिक्सन अपनी सत्ता बरकरार रख पाती हैं या डेनमार्क में सत्ता परिवर्तन होगा।
