Explainer: रक्षा से ऊर्जा तक… ‘अमेरिका या रूस’ भारत के लिए कौन सा देश ज्यादा बेहतर; जानिए पूरा सच
India US bilateral trade: हाल के वैश्विक परिवेश ने यह सवाल और भी महत्वपूर्ण बना दिया है कि भारत के लिए किस देश के साथ साझेदारी करना ज्यादा लाभदायक होगा?
- Written By: अमन उपाध्याय
कब तक चलेगा टैरिफ युद्ध, फोटो (सो.सोशल मीडिया)
India Russia Trade: रूस और अमेरिका दोनों दशकों से भारत के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार रहे हैं। हाल के वैश्विक परिदृश्य ने यह सवाल और भी गंभीर बना दिया है कि भारत के लिए कौन सा सहयोग ज़्यादा लाभकारी होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने पर भारत पर अतिरिक्त 25% टैरिफ़ लगाने का फैसला किया है। इससे पहले से लागू 25% टैरिफ़ के साथ कुल टैरिफ़ अब 50% हो जाएगा।
रूस के साथ भारत के संबंध लंबे समय से मजबूत और भरोसेमंद रहे हैं। रक्षा उपकरणों की खरीद से लेकर ऊर्जा आपूर्ति तक, रूस भारत का एक महत्वपूर्ण सहयोगी रहा है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) की रिपोर्ट के अनुसार, 2019 से 2023 के बीच रूस से भारत के हथियार आयात का हिस्सा 36 प्रतिशत था। हाल ही के वर्षों में रूस से सस्ता कच्चा तेल मिलने से भारतीय अर्थव्यवस्था को काफी मदद मिली है।
किस पक्ष को चुनना ज्यादा फायदेमंद?
वहीं, अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साथी है। वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच व्यापार का 131.84 बिलियन डॉलर पहुंच गया। अमेरिका से भारत की निर्भरता तकनीकी रक्षा उपकरणों से लेकर साफ-सुथरी ऊर्जा के क्षेत्र में बढ़ रही है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अमेरिका और रूस के बीच बढ़ती तनावपूर्ण स्थिति में भारत के लिए किस पक्ष को चुनना ज्यादा फायदेमंद होगा?
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जानें किसका होगा फायदा और किसका नुकसान
भारत अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 88% आयात करता है। वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत के कुल तेल आयात का करीब 35% हिस्सा रूस से आया, जबकि वित्त वर्ष 2018 में यह मात्र 1.3% था। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, जिससे रूस सस्ते दामों पर तेल बेच रहा है और भारत को इससे फायदा हो रहा है।
भारत-रूस की दोस्ती
एक रिपोर्ट के अनुसार, ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने बताया, भारत रूस से सस्ता तेल खरीदकर हर साल लगभग दस अरब डॉलर की बचत कर रहा है। दूसरी ओर, भारत का अमेरिका के साथ लगभग 41 अरब डॉलर का व्यापार अधिशेष है, यानी भारत अमेरिका को करीब 87 अरब डॉलर का सामान निर्यात कर रहा है।
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अजय श्रीवास्तव का कहना है कि अगर ट्रंप का 50 प्रतिशत टैरिफ़ लागू रहता है, तो भारत के निर्यात में 50 अरब डॉलर तक की कमी हो सकती है। वहीं, अगर भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देता है, तो यह टैरिफ़ 25 प्रतिशत रह जाएगा और उस स्थिति में भारत का निर्यात करीब 30 अरब डॉलर तक घट सकता है।
भारत के साथ हमेशा से रूस
विशेषज्ञो का मानना है कि ट्रंप के दबाव के बावजूद भारत अपने रूस के संबंधों को खराब नहीं कर सकता। उनका कहना है, “इतिहास यह दिखाता है कि संकट के समय अमेरिका की तुलना में रूस ने भारत का ज्यादा समर्थन किया है।”
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान रूस ने भारत को सैन्य हथियार, कूटनीतिक मदद और संयुक्त राष्ट्र में समर्थन दिया था। वहीं अमेरिका ने पाकिस्तान का खुलकर साथ दिया और हिंद महासागर में भारत के खिलाफ अपना 7वां बेड़ा तैनात किया था। 1998 में भारत के परमाणु परीक्षण के बाद भी रूस ने हथियारों की आपूर्ति जारी रखी, जबकि उस समय पश्चिमी देश भारत पर विभिन्न प्रतिबंध लगा रहे थे।
अब भारत को क्या करना होगा?
भारत को अपनी व्यापार नीति में विविधता लानी होगी। किसी एक देश पर पूरी तरह निर्भर रहना सही नहीं है। भारत को अब यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूएई जैसे बड़े देशों के साथ अपने व्यापारिक संबंध मजबूत करने होंगे। रिपोर्ट के अनुसार, भारत हर साल लगभग 40 प्रतिशत यानी 25 हजार करोड़ रुपये मूल्य के झींगे अमेरिका को निर्यात करता है, लेकिन अब भारत ने यूके के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट किया है, जिससे भारत यूके को भी झींगा भेज सकेगा, जहां अच्छी मांग है। इस तरह भारत अपने उत्पादों के लिए नए बाजार तलाश सकता है।
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इसके साथ ही भारत को अपने व्यापारियों को सशक्त बनाना होगा ताकि वे नए-नए बाजारों को खोज सकें। साथ ही सरकार को छोटे व्यापारियों का भी समर्थन करना चाहिए ताकि वे ‘मेक इन इंडिया’ को मजबूत कर सकें और विदेशों पर निर्भरता कम हो।
कब तक चलेगा टैरिफ युद्ध?
भारत अमेरिका के लिए अहम है, और अमेरिका भी भारत के बिना काम नहीं कर सकता। वहीं, चीन अमेरिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, इसलिए उसे भारत का सहयोग चाहिए। भारत का बाजार अमेरिका के लिए बहुत बड़ा अवसर है। दोनों देश 2030 तक अपने द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक बढ़ाने का लक्ष्य रखते हैं। अमेरिका की बड़ी कंपनियां भी टैरिफ़ के खिलाफ ट्रंप पर दबाव बना रही हैं। इसलिए माना जा रहा है कि यह टैरिफ़ युद्ध ज्यादा लंबे समय तक नहीं चलेगा।
