अमेरिका OUT, चीन IN? मिडिल ईस्ट संकट में बीजिंग का ‘मास्टरस्ट्रोक’, क्या होर्मुज पर है ‘कब्जे’ की तैयारी
China Iran Strait Of Hormuz Crisis: मध्य पूर्व में जारी युद्ध के बीच विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि चीन और ईरान मिलकर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण जलमार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' पर नियंत्रण कर सकते है।
- Written By: अमन उपाध्याय
डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग, फोटो (सो. एआई)
China Iran Strait Of Hormuz Oil Trade Disruption: मिडिल ईस्ट में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जारी सैन्य संघर्ष ने न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाल दिया है बल्कि अब एक नई वैश्विक भू-राजनीतिक चिंता को भी जन्म दे दिया है। विशेषज्ञों के विश्लेषण की मानें तो इस युद्ध के साये में चीन एक बड़ी कूटनीतिक और रणनीतिक चाल चलने की तैयारी में है।
विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि चीन, ईरान के साथ मिलकर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल जलमार्ग, Strait of Hormuz पर अपना प्रभाव या पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर सकता है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का महत्व
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा के लिए जीवन रेखा के समान है। दुनिया की कुल तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है। बीते 28 फरवरी को ईरान पर हुए अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद से यह जलमार्ग प्रभावी रूप से बंद हो गया है। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखा गया है जिसने अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला को बुरी तरह प्रभावित किया है।
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चीन का क्या है ‘मास्टरस्ट्रोक’?
एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन इस संकट का उपयोग अपनी रणनीतिक बढ़त हासिल करने के लिए कर सकता है क्योंकि चीन और ईरान के बीच बढ़ती नजदीकियां इस जलमार्ग पर एक संयुक्त नियंत्रण की दिशा में बढ़ रही हैं। यदि चीन इस जलमार्ग को नियंत्रित करने में सफल रहता है तो यह वैश्विक ऊर्जा बाजार पर उसके प्रभुत्व को कई गुना बढ़ा देगा जिसे विशेषज्ञ एक ‘रणनीतिक तख्तापलट’ की तरह देख रहे हैं।
25 साल की रणनीतिक साझेदारी
चीन-ईरान के संबंध पिछले कुछ वर्षों में काफी प्रगाढ़ हुए हैं। दोनों देशों ने 2021 में 25 साल की रणनीतिक साझेदारी पर हस्ताक्षर किए थे जिसमें चीन द्वारा ईरान के विभिन्न क्षेत्रों में भारी निवेश और बदले में सस्ते तेल की आपूर्ति शामिल है। चीन पहले ही अमेरिकी प्रतिबंधों की परवाह किए बिना ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार बना हुआ है। इसके अलावा, चीन ने ओमान, UAE, पाकिस्तान और ईरान के विभिन्न बंदरगाहों और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में अरबों डॉलर का निवेश किया है।
अमेरिका की घटती सक्रियता
कार्नेगी के विशेषज्ञ अब्दुल्ला बाबूद का मानना है कि हालांकि चीन के पास वर्तमान में अमेरिका जैसी विशाल सैन्य शक्ति नहीं है कि वह तुरंत एक ‘सुरक्षा गारंटर’ की भूमिका निभा सके लेकिन इस क्षेत्र में अमेरिका की घटती सक्रियता चीन के लिए बड़े अवसर पैदा कर रही है। खाड़ी देश भी अब अपनी सुरक्षा और व्यापार के लिए संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं जो चीन के पक्ष में जा सकता है।
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वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या पड़ेगा प्रभाव?
इस संभावित कब्जे और जारी युद्ध का सबसे बुरा असर भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ने की आशंका है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह विवाद महीनों तक खिंच सकता है जिससे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। महंगा तेल न केवल भारतीय रुपये को कमजोर करेगा बल्कि ब्याज दरों में बढ़ोतरी और आम जनता की जेब पर भारी बोझ डालने का कारण बनेगा।
