
मोहम्मद यूनुस (सोर्स- सोशल मीडिया)
Bangladesh Election Violence: जैसे-जैसे बांग्लादेश 12 फरवरी को होने वाले आम चुनावों के करीब बढ़ रहा है, देश का भविष्य विशेषकर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और अधिकारों को लेकर और अधिक अनिश्चित होता जा रहा है। एक हालिया रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अल्पसंख्यक समुदायों को ऐसी सरकार का सामना करना पड़ सकता है, जो उन्हें समान नागरिक के रूप में स्वीकार करने में विफल रहे।
रिपोर्ट में मौजूदा हालात के लिए मुख्य रूप से मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार को जिम्मेदार ठहराया गया है। आरोप है कि शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण सुनिश्चित करने के बजाय इस सरकार ने आर्थिक अस्थिरता को बढ़ावा दिया, कारोबारी समूहों के खिलाफ कथित अवैध कार्रवाइयां कीं, अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों की अनदेखी की, सामाजिक ध्रुवीकरण को गहराया और बढ़ते इस्लामवादी प्रभाव के प्रति आंखें मूंदे रखीं।
अमेरिका-बांग्लादेश संबंधों पर आधारित एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए ब्रुसेल्स स्थित समाचार वेबसाइट ईयू रिपोर्टर ने एक लीक ऑडियो का जिक्र किया है। इस ऑडियो में ढाका में तैनात एक अमेरिकी राजनयिक को यह कहते हुए सुना गया है कि वह जमात-ए-इस्लामी को बांग्लादेश का “मित्र” बनाना चाहता है।
हालांकि उभरते राजनीतिक दलों से कूटनीतिक संवाद असामान्य नहीं है, लेकिन रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश का सबसे बड़ा इस्लामवादी संगठन है, जिसे रूस पिछले दो दशकों से प्रतिबंधित आतंकी संगठन के रूप में सूचीबद्ध करता रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, “हिंदू विरोधी हिंसा के बाद एक दशक पहले चुनावी पंजीकरण खोने के बावजूद, आम चुनाव से ठीक एक महीने पहले जमात को दूसरे सबसे प्रभावशाली राजनीतिक दल के रूप में देखा जा रहा है। यदि अमेरिका खुलकर जमात का समर्थन करता है, तो यह एक बड़ा नीतिगत बदलाव होगा और संभवतः हाल के वर्षों में अमेरिकी विदेश नीति की सबसे गंभीर भूलों में से एक साबित हो सकता है।”
रिपोर्ट में जमात के ऐतिहासिक संदर्भ को भी रेखांकित किया गया है। इसमें कहा गया है कि इस संगठन की जड़ें बांग्लादेश के गठन के विरोध में हुए आंदोलनों में हैं और यह मुस्लिम ब्रदरहुड की विचारधारा से प्रेरित रहा है। भारत विभाजन के बाद जमात ने पाकिस्तान का समर्थन किया था और बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के दौरान इसके अर्धसैनिक गुटों पर स्वतंत्रता समर्थक नागरिकों के खिलाफ हिंसा करने के आरोप लगे थे।
रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने के बाद कार्यकारी आदेश के जरिए जमात पर लगा प्रतिबंध हटा लिया गया। इसके बाद 2025 में एक बांग्लादेशी अदालत के फैसले से जमात को दोबारा राजनीतिक दल के रूप में पंजीकरण मिल गया।
वापसी के बाद से जमात ने बांग्लादेश की राजनीति में अपनी पकड़ लगातार मजबूत की है। उसकी बढ़ती लोकप्रियता के साथ ही देश में रूढ़िवादी इस्लामी विचारधाराओं के प्रभाव के बढ़ने की आशंका भी गहराती जा रही है, खासकर ऐसे समय में जब समाज पहले से ही गहरे विभाजन से गुजर रहा है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जुलाई 2024 के प्रदर्शनों के बाद महिलाओं को निशाना बनाकर भीड़ हिंसा की घटनाए़ं सामने आई हैं। कई स्थानों पर लड़कियों के खेल आयोजनों को रद्द किया गया, जबकि देशभर में महिलाओं और बच्चों के साथ जघन्य यौन हिंसा के मामलों में भी वृद्धि दर्ज की गई है।
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रिपोर्ट में कहा गया, “जिस देश को लंबे समय तक महिला नेतृत्व के लिए जाना जाता रहा है, वहाँ इस तरह का सामाजिक और नैतिक पतन बेहद चिंताजनक है।” अंत में रिपोर्ट ने चेतावनी दी कि धार्मिक आधार पर गहराई से बंटे समाज, रोहिंग्या शरणार्थी संकट के लगातार दबाव और भारत के साथ तनावपूर्ण संबंधों के बीच हो रहे ये चुनाव शायद वह उम्मीद और स्थिरता नहीं ला पाएँगे, जिसकी बांग्लादेश के कई नागरिक अपेक्षा कर रहे हैं।






