Bangladesh Election 2026: जमात से गठबंधन छात्रों की पार्टी NCP को पड़ा भारी, मिली करारी हार

NCP Election Failure: बांग्लादेश चुनाव 2026 में छात्र आंदोलन से निकली NCP को करारी हार मिली है। जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन और आंतरिक कलह के कारण पार्टी केवल 5 सीटों पर सिमट कर रह गई है।
Bangladesh Election 2026: NCP Student Party Fails to Win After Alliance with Jamaat
बांग्लादेश चुनाव में NCP को मिली करारी हार (सोर्स-सोशल मीडिया)
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Bangladesh Student Party Election Results: अगस्त 2024 में शेख हसीना का तख्तापलट करने वाले छात्र नेता चुनावी राजनीति में नाकाम रहे हैं। 13वें संसदीय चुनाव के परिणामों में 'नेशनल सिटीजन पार्टी' यानी एनसीपी को बहुत बड़ा झटका लगा है। बांग्लादेश स्टूडेंट पार्टी चुनाव के नतीजे के अनुसार क्रांति लाने वाले ये चेहरे चुनावी कूटनीति में फेल हो गए। जनता ने इस नए विकल्प के बजाय पारंपरिक पार्टियों और पुराने चेहरों पर अधिक भरोसा जताया है।

चुनाव परिणाम और हार

बांग्लादेश के हालिया चुनाव नतीजों ने सभी को चौंका दिया है और युवा छात्रों को काफी निराश किया है। 30 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली एनसीपी केवल 5 सीटों पर ही जीत हासिल कर पाई है। यह उन हजारों युवाओं के लिए बड़ा झटका है जिन्होंने एक नए राजनीतिक विकल्प की उम्मीद की थी। क्रांति के नायकों का यह प्रदर्शन उनके प्रभाव के मुकाबले बहुत ही ज्यादा कमजोर और फीका रहा है। छात्र शक्ति ने सड़कों पर तो जीत हासिल की लेकिन मतपेटियों में वे बुरी तरह पिछड़ गए हैं। चुनावी मैदान में पार्टी का यह फ्लॉप प्रदर्शन देश की राजनीति की नई दिशा को साफ दर्शाता है।

जमात के साथ का असर

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन करना पार्टी की सबसे बड़ी भूल थी। इस 11-दलीय गठबंधन ने उदारवादी मतदाताओं को पार्टी से पूरी तरह से दूर और अलग कर दिया है। कट्टरपंथी विचारधारा के साथ हाथ मिलाने से एनसीपी की अपनी साख को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचा है। समावेशी और लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करने वाले छात्रों ने अचानक कट्टरपंथियों से हाथ मिला लिया था। इससे पार्टी का उदारवादी वोटर छिटक कर खालिदा जिया की पार्टी बीएनपी की तरफ चला गया। इसी कारण चुनावी समीकरण बिगड़ गए और नई पार्टी को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है।

पार्टी में आंतरिक कलह

गठबंधन के फैसले ने पार्टी के भीतर भी असंतोष और गहरा विद्रोह पैदा कर दिया था। जमात के साथ हाथ मिलाने के विरोध में कई महिला नेताओं ने पार्टी से तुरंत इस्तीफा दिया। उनका आरोप था कि पार्टी के फैसलों में उन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज और उपेक्षित किया गया। महिला नेताओं के जाने से पार्टी की जमीनी पकड़ और संगठन को काफी ज्यादा नुकसान पहुंचा। नेतृत्व के फैसलों पर उठे सवालों ने चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी की बनी-बनाई छवि बिगाड़ी। अपनों की नाराजगी और वोट बैंक के खिसकने ने ही अंततः हार की पटकथा लिख दी थी।

धांधली के गंभीर आरोप

हार के बाद एनसीपी अब प्रशासनिक हेरफेर और नतीजों में बड़ी धांधली के गंभीर आरोप लगा रही है। पार्टी प्रवक्ता आसिफ महमूद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि कई सीटों पर नतीजों के साथ छेड़छाड़ हुई। ढाका की कई प्रमुख सीटों पर चुनाव परिणामों को संदिग्ध और पूरी तरह से गलत बताया गया है।

एनसीपी का दावा है कि ढाका-15 में जमात के नेता काफी बड़े अंतर से जीत रहे थे। लेकिन अचानक बिना किसी ठोस तर्क के वहां बीएनपी उम्मीदवार को विजेता घोषित कर दिया गया। पार्टी ने अब कई सीटों पर दोबारा मतगणना कराने की चुनाव आयोग से आधिकारिक मांग की है।

चुनावी राजनीति की सीख

सड़क पर क्रांति लाना और असल चुनाव जीतना दो बिल्कुल अलग बातें साबित हो रही हैं। छात्र नेता संसद तक पहुंचने के लिए जरूरी चुनावी कूटनीति और प्रबंधन में बुरी तरह मात खा गए। केवल नारों के दम पर सत्ता हासिल करना इन युवाओं के लिए फिलहाल मुमकिन नहीं हुआ है।

जनता ने बदलाव तो चाहा लेकिन वह कट्टरपंथी गठबंधन के समर्थन में नजर नहीं आई। अब एनसीपी को अपनी हार के कारणों पर गहराई से आत्ममंथन करने की बहुत ज्यादा जरूरत है। भविष्य में अपनी साख बचाने के लिए उन्हें एक नई और स्पष्ट राजनीति पर काम करना होगा।

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