इथियोपिया में फटी ज्वालमुखी की राख से हो सकती हैं हवाई जहाज दुर्घटनाएं, जानें कितना है खतरनाक
Ethiopia volcanic ash: इथियोपिया में फटी ज्वालामुखी अब कई देशों के लिए चिंता का विषय बन गया है। इसकी राख भारत भी पहुंच गई है, जो सबसे ज्यादा हवाई जहाजों के लिए खतरनाक है।
- Written By: रंजन कुमार
ज्वालामुखी फटी। इमेज-सोशल मीडिया
How Dangerous Is Volcanic Ash For Flights: इथियोपिया में ज्वालामुखी के सक्रिय होने और आसमान में राख का विशाल गुबार फैलने से कई एयरलाइंस की उड़ानें प्रभावित हुई हैं। अधिकतर लोग ज्वालामुखी की राख को साधारण धुएं या हल्की धूल समझकर नजरअंदाज करते हैं। मगर, यह बेहद बारीक, नुकीले और खनिजों से बने कणों का घना मिश्रण होती है। विस्फोट के बाद यह राख 10 से 15 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचती है। ठीक वहीं जहां ज्यादातर यात्री विमान उड़ते हैं।
ज्वालामुखी की राख का सबसे बुरा असर सीधे विमान के इंजन पर पड़ता है। राख के कण इंजन में घुसकर उसकी गर्मी के संपर्क में आते ही पिघलते हैं और टर्बाइन ब्लेड्स पर चिपककर हवा का रास्ता बंद करते हैं। इस स्थिति में इंजन अचानक बंद हो सकता है। यह बड़े हादसे का कारण बन सकता है।
पायलटों को साफ दिखना हो जात है बंद
कांच जैसे नुकीले राख के कण तेज रफ्तार से विमान के शीशों से टकराकर उन्हें खरोंचते हैं। कुछ ही मिनटों में कॉकपिट की विंडो इतनी धुंधली हो जाती है कि बाहर का न तो आसमान दिखता है और न रनवे साफ नजर आता है। इससे पायलट की विजिबिलिटी करीब-करीब शून्य हो सकती है। आधुनिक विमान सेंसरों और सटीक डेटा पर चलते हैं। मगर, ज्वालामुखी की राख इन सेंसरों को ब्लॉक कर सकती है। इससे स्पीड गलत दिखने की आशंका है। ऊंचाई की जानकारी बिगड़ सकती है। तापमान की रीडिंग गड़बड़ा सकती है। गलत डेटा उड़ान को खतरनाक स्थिति में पहुंचा सकता है।
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यात्रियों को भी सीधे तौर पर पहुंचा सकती है नुकसान
जब राख तेज रफ्तार में विमान की बॉडी से टकराती है तो यह रेत के तूफान की तरह असर करती है। इससे एयरक्राफ्ट की बाहरी धातु, पेंट और सतह को नुकसान पहुंचता है। अगर, राख एयर कंडीशनिंग सिस्टम में चली जाए तो यात्री केबिन में जले हुए धुएं जैसी गंध आने लगती है। इससे घबराहट और असहजता बढ़ सकती है।
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पायलट का ATC से संपर्क कर सकता है बाधित
कई बार ज्वालामुखी राख रेडियो सिग्नल को भी कमजोर कर देती है। इससे पायलट का एयर ट्रैफिक कंट्रोल से संपर्क बाधित हो सकता है। संचार टूटने पर विमान को सुरक्षित मार्गदर्शन नहीं मिलता है। इससे उड़ान की जोखिम और बढ़ जाती और इमरजेंसी स्थिति बन सकती है। जैसे ही किसी क्षेत्र में ज्वालामुखी विस्फोट बाद राख का बादल उठता है तो एयरलाइनें तुरंत उस रूट की उड़ानें रोक देती हैं। सैटेलाइट, मौसम विभाग और एवीएशन एजेंसियां राख के मूवमेंट पर नजर रखती हैं। यात्रियों की सुरक्षा के लिए फ्लाइटें डायवर्ट, देरी या रद्द की जाती हैं, जिससे किसी भी तरह की दुर्घटना की आशंका खत्म की जा सके।
