‘जायंट किलर’ से जमीनी पकड़ तक…वो 5 कारण, जिससे सुवेंदु बने बंगाल के ‘अधिकारी’
Suvendu Adhikari: टीएमसी से निकलने और भाजपा में शामिल होने के बाद सुवेंदु अधिकारी बंगाल विधानसभा में विपक्ष का नेता चुने गए। इस भूमिका में रहते हुए कई मौकों पर लोगों ने उनका आक्रामक तेवर देखा।
- Written By: मनोज आर्या
पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री होंगे सुवेंदु अधिकारी, (कॉन्सेप्ट फोटो)
Why Suvendu Adhikari Become Chief Minister: पश्चिम बंगाल में नए मुख्यमंत्री के नाम के ऐलान हो गया है। भारतीय जनता पार्टी ने सुवेंदु अधिकारी को राज्य में अपने पहले मुख्यमंत्री के रूप में चुना है। बीजेपी के विधायक दल की बैठक के बाद केंद्रीय पर्यवेक्षक अमित शाह ने सुवेंदु के नाम का ऐलान किया। इससे पहले मुख्यमंत्री के रेस में 5 नामों की चर्चा चल रही थी। कुछ लोगों का ऐसा भी कहना था कि बीजेपी बंगाल में किसी महिला को भी मुख्यमंत्री बना सकती है। सीएम की घोषणा से पहले सुवेंदु अधिकारी, दिलीप घोष, समीक भट्टाचार्य, अग्निमित्रा पॉल और रूपा गांगुली को लेकर अटकलें थी।
पार्षद से विधायक और फिर सांसद से मुख्यमंत्री तक का सफर तय करने वाले सुवेंदु अधिकारी के नाम की चर्चा बंगाल के साथ-साथ पूरे देश में हो रही है। भवानीपुर विधानसभा सीट पर सुवेंदु ने ममता बनर्जी को करारी शिकस्त दी थी, जिसके बाद भाजपा ईनाम के तौर पर राज्य की कमान उनके हाथों में सौंप रही है। आइए उन 5 कारणों को जानते हैं, जिसने सुवेंदु अधिकारी को बंगाल सीएम की रेस में सबसे मजबूत दावेदार बनाया।
1. भवानीपुर में ऐतिहासिक जीत
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री की रेस में सुवेंदु अधिकारी की सबसे बड़ी ताकत भवानीपुर विधानसभा सीट पर तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को करारी शिकस्त देना है। पहले नंदीग्राम और अब भवानीपुर में ममता के खिलाफ बड़ी जीत ने न उन्हें सिर्फ ‘जायंट किलर’ के रूप में पहचान दिया, बल्कि बीजेपी के अंदर उनके सियासी कद को इतना ऊंचा कर दिया कि उनके आगे सारे दावेदार कमतर नजर आने लगे। एक मौजूदा मुख्यमंत्री को दो बार मात देना उनकी राजनीतिक कुशलता का सबसे बड़ा प्रमाण के रूप में देखा जा रहा है।
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(भवानीपुर के ‘जायंट किलर’ सुवेंदु अधिकारी)
2. एक मजबूत व्यक्तिगत जनाधार
सुवेंदु अधिकारी सिर्फ भाषण और बयान देने वाले नेता नहीं हैं, बल्कि वे एक मंझे हुए जमीनी नेता हैं। इसके साथ ही वे संगठन के काम-काजों को भी बेहतर ढंग से समझते हैं। भाजपा में आने से पहले टीएमसी में रहते हुए उन्होंने सालों तक बूथ लेवल पर काम किया है, जिससे उन्हें पश्चिम बंगाल की राजनीतिक और भौगोलिक नस-नस का पता है। मेदिनीपुर और जंगलमहल के क्षेत्रों में उनका अपना एक मजबूत व्यक्तिगत जनाधार है, जो किसी पार्टी की लहर से इतर उनके साथ खड़ा रहता है।
3. पुत्र बनाम बाहरी का नैरेटिव
टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी अक्सर बीजेपी नेताओं को बाहरी बताकर निशाना साधती रही हैं, लेकिन सुवेंदु के मामले में उनका यह निशाना चूक जाता है। सुवेंदु खुद को ‘भूमिपुत्र’ यानी (मिट्टी का बेटा) के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनका पहनावा, भाषा और लोगों से जुड़ने का अंदाज पूरी तरह से स्थानीय और बंगाली संस्कृति से जुड़ा है। अपने इस साधारण अंदाज के जरिए वह आम जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाए रखने में सफल होते हैं।
(बंगाल के मुख्यमंत्री के रूप में नाम की घोषणा के बाद अमित शाह के साथ सुवेंदु अधिकारी)
4. आक्रामक तेवर और जुझारू नेता
टीएमसी से निकलने और भाजपा में शामिल होने के बाद सुवेंदु अधिकारी बंगाल विधानसभा में विपक्ष का नेता चुने गए। इस भूमिका में रहते हुए कई मौकों पर लोगों ने उनका आक्रामक तेवर देखा। वे राज्य की ममता सरकार की नीतियों और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर सीधे हमले करते नजर आते थे। आम लोगों के मुद्दों को लेकर बार-बार कोर्ट का दरवाजा खटखटाना और कानूनी लड़ाई लड़ना उन्हें अन्य नेताओं से अलग एक जुझारू नेता के रूप में स्थापित करता है।
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5. हिंदुत्व पर मुखर सुवेंदु अधिकारी
सुवेंदु अधिकारी लंबे समय से बंगाल की राजनीति में सक्रिय हैं। हालांकि, टीएमसी छोड़ने के बाद उन्होंने राजनीति के बदलते मिजाज को अच्छे तरीके से समझा। वे मुखर होकर हिंदुत्व की राजनीति और सनातन मूल्यों की बात करते हैं, जो राज्य के एक बड़े वर्ग को अपनी ओर खिंचता है। इसके अलावा, मतुआ समुदाय और अन्य पिछड़े वर्गों के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध ने 2026 विधानसभा चुनाव में बीजेपी के लिए काफी मददगार साबित हुई।
