‘ऑपरेशन क्राउन प्रिंस’ से टीएमसी में हड़कंप! ममता संग आने वाले थे अभिषेक, फिर अचानक अकेले क्यों पहुंचे दिल्ली?
TMC Political Crisis: पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी टीएमसी में 'ऑपरेशन क्राउन प्रिंस' के तहत भारी बगावत हो गई है। संसदीय दल में टूट के बड़े खतरे और संकट के बीच अभिषेक बनर्जी दिल्ली पहुंचे।
- Written By: प्रिया सिंह
तृणमूल कांग्रेस राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी और बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (सोर्स- सोशल मीडिया)
News About TMC Political Crisis: पश्चिम बंगाल की प्रमुख पार्टी तृणमूल कांग्रेस में इस समय बहुत ही भारी अंदरूनी घमासान मचा हुआ है और पार्टी गहरे संकट में है। पार्टी के संसदीय दल में विद्रोह फैलने की गंभीर आशंकाओं के बीच राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी अचानक शनिवार को दिल्ली पहुंच गए हैं। सूत्रों के अनुसार ममता बनर्जी ने ही अपने भतीजे अभिषेक को तय समय से एक दिन पहले दिल्ली जाने का खास निर्देश दिया था। इस अचानक हुए दौरे से दिल्ली से लेकर कोलकाता तक के पूरे राजनीतिक गलियारों में बहुत ही भारी हलचल और बेचैनी मच गई है।
अभिषेक बनर्जी के इस अहम दिल्ली दौरे को राजनीतिक नजरिए से बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण और बड़ा कदम माना जा रहा है क्योंकि हालात तनावपूर्ण हैं। ममता बनर्जी ने उन्हें सोमवार की अहम बैठक से पहले दिल्ली की पूरी स्थिति का सटीक जायजा लेने के लिए वहां भेजा है। अभिषेक को सोमवार को ही विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर विवाद में सीआईडी के सामने भी अपनी अहम पेशी के लिए जाना है। जांच एजेंसी ने खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर अतिरिक्त समय मांगने की उनकी इस विशेष अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया था।
‘ऑपरेशन क्राउन प्रिंस’ से बड़ी बगावत
बंगाल विधानसभा में टीएमसी के 80 में से 58 विधायकों ने अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ बहुत बड़ी और खुली बगावत कर दी है। इस पूरे बागी अभियान को ‘ऑपरेशन क्राउन प्रिंस’ का नाम दिया गया है जिसने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की पूरी नींद उड़ा दी है।
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इन सभी बागी विधायकों ने निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में खुद को मुख्य विपक्षी गुट के रूप में मान्यता हासिल कर ली है। यह टीएमसी के लिए अब तक का सबसे बड़ा और खतरनाक राजनीतिक झटका माना जा रहा है जिससे उबरना पार्टी के लिए काफी मुश्किल होगा।
संसदीय दल में भी टूट का भारी खतरा
टीएमसी के बागी विधायक और नए उपनेता संदीपन साहा ने दावा किया है कि दिल्ली में संसदीय दल के अंदर भी बंगाल जैसा ही घटनाक्रम तेजी से चल रहा है। साहा ने खुला आरोप लगाया कि यह सब सिर्फ अभिषेक बनर्जी की तानाशाही की वजह से हो रहा है जिससे पार्टी के कई वरिष्ठ नेता काफी नाराज हैं।
हाजी नूरुल इस्लाम के दुखद निधन के बाद अब लोकसभा में टीएमसी के पास वर्तमान में कुल 28 सदस्य ही बचे हुए हैं जिससे संख्या बल घटा है। दल-बदल कानून से बचने के लिए किसी भी बागी गुट को कम से कम दो-तिहाई यानी 19 लोकसभा सांसदों के पक्के समर्थन की सख्त जरूरत होगी।
सांसदों को एकजुट करने की तेज कोशिश
लोकसभा के अलावा राज्यसभा में भी तृणमूल कांग्रेस पार्टी के कुल 13 सांसद मौजूद हैं जिन पर बागी नेताओं की पूरी और पैनी नजर लगातार बनी हुई है। दिल्ली में बागी गुट के नेताओं ने अपनी रणनीति के तहत शुक्रवार रात से ही पार्टी के सांसदों से फोन पर अपना संपर्क काफी तेज कर दिया है।
संसद के दोनों सदनों में बागी नेताओं द्वारा पार्टी के बाकी सांसदों को अपने गुट में एकजुट करने के गुप्त प्रयास काफी तेज कर दिए गए हैं। पार्टी के कई सांसद इस बात को लेकर अनिश्चित हैं कि आगे क्या होगा और अभिषेक बनर्जी का दिल्ली का रविवार का कार्यक्रम क्या रहने वाला है।
बीजेपी पर लगाया गया तोड़फोड़ का आरोप
इन तमाम बड़ी और मुश्किल चुनौतियों के बीच टीएमसी के वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय ने पार्टी के पूरी तरह से बिखरने के सभी दावों को सिरे से खारिज किया है। सौगत रॉय ने सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी पर विधानसभा की तरह संसद में भी ऑपरेशन चलाने और पार्टी को तोड़ने की कोशिश करने का आरोप लगाया है।
उन्होंने बड़े ही विश्वास के साथ कहा कि ममता बनर्जी ने अतीत में इससे भी बड़ी लड़ाइयां सफलतापूर्वक लड़ी हैं और वह फिर से एक बहुत ही शानदार वापसी करेंगी। ममता बनर्जी के करीबी और वफादार नेताओं का भी यही मानना है कि मीडिया में बगावत की इन सभी बड़ी खबरों को बहुत ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है।
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टीएमसी नेतृत्व के सामने एकता की अग्निपरीक्षा
पार्टी के कुछ नेताओं के बड़े दावों के बावजूद यह बिल्कुल कड़वी हकीकत है कि हफ्ता भर पहले की तुलना में टीएमसी के लिए अब मुश्किलें बहुत ज्यादा बढ़ चुकी हैं। पार्टी के भीतर चल रही इस भारी कलह और गुटबाजी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में कई नए और गंभीर सवाल पूरी तरह से खड़े कर दिए हैं।
अब तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के सामने अपने संसदीय दल की एकता को किसी भी तरह से बचाए रखने और डैमेज कंट्रोल करने की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है। पार्टी को अपने नाराज विधायकों और सांसदों को वापस अपने खेमे में लाने के लिए एक बहुत ही मजबूत और नई रणनीतिक योजना पर तुरंत काम करना होगा।
