पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (डिजाइन फोटो)
Mamata Banerjee: राइटर्स बिल्डिंग कभी पश्चिम बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा पावर सेंटर हुआ करती थी, जहां से वामपंथी सरकार और मुख्यमंत्री ज्योति बसु अपना राजकाज चलाते थे। साल 1993 की जनवरी में एक सर्द रात को इसी ऐतिहासिक इमारत के सामने भारी हंगामा मचा हुआ था। एक मूकबधिर बलात्कार पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए मुख्यमंत्री से मिलने पहुंची एक युवा महिला नेता को पुलिस ने बालों से पकड़कर घसीटा और इमारत से बाहर फेंक दिया। उस वक्त अपमान का घूंट पीने वाली उस महिला ने शायद ही किसी ने सोचा होगा कि वह एक दिन इसी इमारत में राज्य की मुख्यमंत्री बनकर लौटेगी।
उस रात जो हुआ वह लोकतंत्र के लिए शर्मनाक था। नदिया जिले की एक पीड़िता, जिसके साथ सीपीएम के एक नेता पर बलात्कार का आरोप था, उसे न्याय नहीं मिल रहा था। जब युवा कांग्रेस नेता उसे लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंचीं, तो ज्योति बसु ने मिलने से इनकार कर दिया। इसके बाद वह नेता वहीं धरने पर बैठ गईं। पुलिस ने बर्बरता दिखाई और गर्भवती पीड़िता समेत उस नेता को हवालात भेज दिया।
जेल से छूटने के बाद उस महिला ने कसम खाई कि वह अब राइटर्स बिल्डिंग में तभी कदम रखेंगी जब उनका सिर गर्व से ऊंचा होगा। वह महिला कोई और नहीं, बल्कि ममता बनर्जी थीं। ठीक 18 साल बाद, 20 मई 2011 को ममता ने अपनी कसम पूरी की और हजारों समर्थकों के साथ मुख्यमंत्री के रूप में उसी बिल्डिंग में प्रवेश किया, जहां से उन्हें कभी धक्के मारकर निकाला गया था।
हिंदुस्तान की राजनीति में यह कल्पना करना मुश्किल है कि एक लोअर मिडिल क्लास की महिला बिना किसी गॉडफादर के सत्ता के शिखर तक पहुंच जाए। ममता बनर्जी की कहानी इसी अदम्य साहस की मिसाल है। ममता का जन्म दुर्गाष्टमी के दिन हुआ था, हालांकि स्कूल के रिकॉर्ड में तारीख 5 जनवरी 1955 है। महज 17 साल की उम्र में पिता का साया सिर से उठ गया। घर की जिम्मेदारी ममता के कंधों पर आ गई, लेकिन उन्होंने राजनीति नहीं छोड़ी। वह कोलकाता के उसी 30-बी वाले छोटे से घर में रहती थीं और कॉलेज की राजनीति में कांग्रेस के छात्र संगठन को मजबूत कर रही थीं। 1970 के दशक में जब नक्सलबाड़ी आंदोलन और वामपंथ का जोर था, ममता ने सड़कों पर उतरकर संघर्ष का रास्ता चुना।
ममता का अंदाज शुरू से ही बागी था। 1975 में जयप्रकाश नारायण की कार के बोनट पर चढ़ना हो या प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को काला झंडा दिखाना, ममता कभी पीछे नहीं हटीं। सीपीएम की मिलिशिया से उनकी लड़ाई हर दिन की बात हो गई थी। उनकी ‘किताब माई अनफॉरगेटेबल मेमोरीज’ के मुताबिक, साल के 365 दिनों में से 330 दिन वह सड़कों पर संघर्ष करती थीं। उन पर कई बार जानलेवा हमले हुए। उनके घर पर बम फेंके गए। 16 अगस्त 1990 को हाजरा मोड़ पर लालू आलम नाम के एक शख्स ने उनके सिर पर लोहे की रॉड से हमला किया, जिससे वह बुरी तरह घायल हो गईं और लंबे समय तक अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझती रहीं।
राजीव गांधी से उनकी मुलाकात 1983 में हुई और 1984 के लोकसभा चुनाव में ममता को जादवपुर जैसी मुश्किल सीट से टिकट मिला। उनके सामने वामपंथ के दिग्गज सोमनाथ चटर्जी थे। लोगों को लगा ममता हार जाएंगी, लेकिन 29 साल की इस लड़की ने विशालकाय नेता को हराकर संसद में प्रवेश किया। संसद में भी उनका तेवर तीखा रहा। एक बार बहस के दौरान उन्होंने अपना चांदी का कड़ा उतारकर विपक्ष के सामने रख दिया था और चुनौती दी थी। जब एक सांसद ने उनकी मेज पर जूते रखे, तो राजीव गांधी ने फोन करके उनका हौसला बढ़ाया और कहा कि वह डटकर मुकाबला करें।
राइटर्स बिल्डिंग कोलकाता (सोर्स- सोशल मीडिया)
राजीव गांधी की हत्या ममता बनर्जी के लिए एक बड़ा निजी झटका थी, वह उन्हें अपना संरक्षक मानती थीं। राजीव गांधी के जाने के बाद ममता का कांग्रेस के भीतर ही संघर्ष शुरू हो गया। वह बंगाल कांग्रेस के उन नेताओं से नाराज थीं जो वामपंथियों के प्रति नरम रुख रखते थे। ममता उन्हें तरबूज कहती थीं, जो ऊपर से हरे और अंदर से लाल थे। उनका मानना था कि कांग्रेस सीपीएम की बी-टीम बन गई है। 1993 में जब पुलिस फायरिंग में 13 कार्यकर्ता मारे गए, तो ममता ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया।
1997 में कांग्रेस अधिवेशन के दौरान उन्होंने अपनी अलग रैली की और ऐलान किया कि वह अब तृणमूल यानी जमीनी स्तर पर लड़ाई लड़ेंगी। सोनिया गांधी ने उन्हें मनाने की कोशिश की, लेकिन ममता का फैसला अटल था। 1 जनवरी 1998 को तृणमूल कांग्रेस का गठन हुआ। ममता का सफर आसान नहीं था। एनडीए सरकार में वह रेलमंत्री बनीं, लेकिन वैचारिक मतभेद चलते रहे। 2004 में उनकी पार्टी सिमटकर सिर्फ एक सीट पर रह गई, वह सीट खुद ममता की थी।
2006 के विधानसभा चुनाव में भी करारी हार मिली, लेकिन ममता ने हार नहीं मानी। परिवर्तन का असली मौका तब आया जब लेफ्ट सरकार ने सिंगूर और नंदीग्राम में जबरन जमीन अधिग्रहण शुरू किया। ममता ने किसानों की आवाज उठाई और 26 दिनों तक आमरण अनशन किया। तापसी मलिक जैसी कार्यकर्ता की बलात्कार के बाद हत्या ने आंदोलन की आग में घी डाल दिया। टाटा को नैनो प्लांट लेकर गुजरात जाना पड़ा और यही लेफ्ट के पतन की शुरुआत थी। 2011 में ममता ने ‘मां, माटी, मानुष’ के नारे के साथ 34 साल पुराने वामपंथी किले को ढहा दिया।
2011 में मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी ने बंगाल में विकास और लोकलुभावन योजनाओं की झड़ी लगा दी, लेकिन सत्ता के साथ नई चुनौतियां भी आईं। जो ममता कभी वामपंथियों पर गुंडागर्दी और भ्रष्टाचार का आरोप लगाती थीं, धीरे-धीरे उनकी पार्टी पर भी वैसे ही आरोप लगने लगे। शारदा चिटफंड घोटाला, नारदा स्टिंग ऑपरेशन, कोयला तस्करी और शिक्षक भर्ती घोटाला जैसे मामलों ने उनकी सरकार को घेरे में ले लिया। उनके कई मंत्री और विधायक जेल गए। केंद्रीय एजेंसियों के साथ उनका टकराव लगातार सुर्खियों में रहा। ममता बनर्जी केंद्र सरकार पर भेदभाव का आरोप लगाती रहीं और खुद को बंगाली अस्मिता का रक्षक बताती रहीं।
पिछले कुछ सालों में बंगाल की राजनीति में एक बड़ा बदलाव आया है। लेफ्ट और कांग्रेस हाशिए पर चले गए हैं और भारतीय जनता पार्टी मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरी है। 2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने पूरी ताकत झोंक दी थी। ममता के करीबी सुवेंदु अधिकारी बीजेपी में शामिल हो गए और नंदीग्राम सीट पर ममता को हरा दिया। इसके बावजूद, ममता की पार्टी ने शानदार जीत दर्ज की और तीसरी बार सरकार बनाई। बंगाल की राजनीति अब हिंसक दौर से गुजर रही है, जहां जय श्री राम के नारे और बाहरी बनाम बंगाली के मुद्दे हावी हैं।
ममता बनर्जी का व्यक्तित्व अनप्रेडिक्टेबल है। वह गुस्से में ही नहीं रहतीं, बल्कि पेंटिंग करती हैं, कविताएं लिखती हैं और पियानो भी बजाती हैं। उनका सादा जीवन, हवाई चप्पल और सूती साड़ी आज भी उनकी पहचान है। वह एक ऐसी स्ट्रीट फाइटर हैं जो किसी भी प्रोटोकॉल की परवाह किए बिना जनता के बीच पहुंच जाती हैं। आरजी कर मेडिकल कॉलेज रेप केस के दौरान जब विरोध प्रदर्शन हुए, तो ममता खुद न्याय की मांग करते हुए सड़क पर उतरीं, हालांकि उनकी पुलिस पर ही मामले को दबाने के आरोप लगे।
ममता बनर्जी (सोर्स- सोशल मीडिया)
आज बंगाल की राजनीति में धर्म और जाति का असर साफ दिखने लगा है। मुस्लिम वोट बैंक टीएमसी का मजबूत आधार बना हुआ है, जबकि भारतीय जनता पार्टी हिंदू वोटों को एकजुट करने में लगी है। ममता बनर्जी के लिए आगे की राह आसान नहीं है। उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं और पार्टी के पुराने साथी साथ छोड़ रहे हैं। फिर भी, ममता बनर्जी भारतीय राजनीति की वह पहेली हैं जिन्हें कम आंकना किसी भी विरोधी के लिए भारी भूल साबित हो सकता है।
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एक साधारण महिला का इतने लंबे समय तक सत्ता पर पकड़ बनाए रखना अपने आप में रिसर्च का विषय है। संसद में एक बार जब उन्हें गिराया गया था तो वह उसका कॉलर पकड़कर बाहर छोड़ आई थीं। उन्होंने कहा था कि वह बाल पकड़कर खींचना चाहती थीं, लेकिन सांसद के गंजा होने के कारण ऐसा नहीं कर सकीं। यह किस्सा बताता है कि ममता बनर्जी का सेंस ऑफ ह्यूमर और गुस्सा दोनों ही राजनीति के गलियारों में चर्चा का विषय बने रहते हैं। फिलहाल, वह मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष का एक मजबूत चेहरा हैं और बंगाल के किले को बचाए रखने के लिए अपनी पूरी ताकत से डटी हुई हैं।
Ans: एक मूकबधिर बलात्कार पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए मुख्यमंत्री से मिलने पहुंची युवा महिला नेता ममता बनर्जी को पुलिस ने बालों से पकड़कर घसीटा और इमारत से बाहर फेंक दिया।
Ans: 1997 में कांग्रेस अधिवेशन के दौरान उन्होंने अपनी अलग रैली की और ऐलान किया कि वह अब तृणमूल यानी जमीनी स्तर पर लड़ाई लड़ेंगी। सोनिया गांधी ने उन्हें मनाने की कोशिश की, लेकिन ममता का फैसला अटल था। 1 जनवरी 1998 को तृणमूल कांग्रेस का गठन हुआ।
Ans: 2011 में ममता ने 'मां, माटी, मानुष' के नारे के साथ 34 साल पुराने वामपंथी किले को ढहा दिया और वह बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बन गईं।