ममता बनर्जी और पीएम मोदी। इमेज-एआई
BJP Outsider Narrative Bengal : पश्चिम बंगाल की राजनीति का व्याकरण बाकी देश से थोड़ा जुदा है। यहां सत्ता की चाबी केवल विकास या दावों से नहीं, बल्कि अस्मिता और संस्कृति के उस ताले से खुलती है, जिसे ममता बनर्जी ने बखूबी पहचान लिया है।
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए बंगाल का किला फतह करना इसलिए भी मुश्किल हो रहा है, क्योंकि यहां की लड़ाई राजनीतिक विचारधारा से ज्यादा सांस्कृतिक श्रेष्ठता की बन जाती है। आइए समझते हैं कि कैसे ममता बनर्जी का बंगाली कार्ड बीजेपी के हर दांव को कुंद कर देता है।
ताजा विवाद 19 फरवरी को रामकृष्ण परमहंस की जयंती पर शुरू हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनके नाम के आगे स्वामी लगा दिया। सुनने में यह एक सामान्य सम्मानजनक शब्द लगता है, लेकिन बंगाल की सांस्कृतिक रगों को पहचानने वाली ममता बनर्जी ने इसे तुरंत लपक लिया। ममता बनर्जी ने इसे पीएम मोदी की सांस्कृतिक संवेदनहीनता करार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि बंगाल की परंपरा में रामकृष्ण परमहंस को हमेशा ठाकुर कहा जाता है। वहीं, स्वामी शब्द उनके शिष्यों (जैसे स्वामी विवेकानंद) के लिए आरक्षित है। ममता ने स्पष्ट किया कि बंगाल की पवित्र त्रयी में ठाकुर, मां और स्वामीजी का स्थान निश्चित है। टीएमसी का आरोप है कि बीजेपी बिना बंगाल की जड़ों को समझे, अपनी पसंद के उपसर्ग थोप रही है। इससे पहले राज्यसभा में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को बंकिम दा कहना भी टीएमसी ने उनका अपमान बताया था।
अधिवक्ता और बंगाल की सांस्कृतिक समितियों से जुड़े अंजन दत्ता बताते हैं कि ममता बनर्जी ने दशकों पहले मां, माटी और मानुष का जो नैरेटिव सेट किया था, वह आज एक अभेद्य दीवार बन चुका है। बीजेपी के साथ समस्या यह है कि उसके शीर्ष चेहरे (पीएम मोदी, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ) हिंदी भाषी राज्यों से आते हैं। जब भी ये नेता बंगाल में बड़ी रैलियां करते हैं, टीएमसी इसे दिल्ली का बंगाल पर हमला बताकर क्षेत्रीय गौरव का मुद्दा बना देती है।
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टीएमसी की जीत और बीजेपी की मुश्किलों के पीछे कई गहरे कारण हैं-
1. सांस्कृतिक अनभिज्ञता के आरोप : बीजेपी नेताओं से अनजाने में हुई भाषाई या सांस्कृतिक चूक टीएमसी के लिए हथियार बन जाती है। चाहे वह विद्यासागर की मूर्ति टूटने का मामला हो या महापुरुषों के संबोधन में गलती, टीएमसी इसे बंगाली अस्मिता पर चोट के रूप में पेश करने में सफल रहती है।
2. जीवनशैली और खान-पान का अंतर : बंगाल की संस्कृति में मछली और मांस का सेवन धर्म का हिस्सा माना जाता है। यहां तक कि विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस के संदर्भ में भी इसके उल्लेख मिलते हैं। बीजेपी की छवि अक्सर शाकाहार समर्थक और बैन लगाने वाली पार्टी की है। टीएमसी जनता को यह समझाने में सफल रहती है कि बीजेपी बंगाल के उदारवादी और बहुरंगी खान-पान को बदलना चाहती है।
3. चेहरे का अभाव : बंगाल में आज भी मुकाबला ममता बनाम पीएम मोदी ही रहता है। टीएमसी यह नैरेटिव सेट कर देती है कि चुनाव के बाद मोदी जी दिल्ली चले जाएंगे और बंगाल बाहरी रिमोट कंट्रोल से चलेगा। राज्य में सुवेंदु अधिकारी जैसे नेताओं का कद अभी इतना बड़ा नहीं हुआ है कि वे ममता की दीदी वाली छवि को टक्कर दे सकें।
4. पुनर्जागरण की विरासत : बंगाल राजा राममोहन राय, टैगोर और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की धरती है। यहां के लोग अपनी प्रगतिशील और आधुनिक पहचान पर गर्व करते हैं। टीएमसी यह प्रचार करने में कामयाब रहती है कि बीजेपी की विचारधारा बंगाल के इस गौरवशाली और प्रगतिशील इतिहास के विपरीत है।