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अविमुक्तेश्वरानंद नहीं ये हैं असली शंकराचार्य? स्वामी जितेंद्रानंद ने बताया इतिहास और पूरा विवाद
Magh Mela Controversy: शंकराचार्य पद विवाद में, 165 वर्षों तक पीठ खाली रही। 1941 में स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती आए, उन्होंने स्वामी शांतानंद को नियुक्त किया, जिसे कोर्ट ने वैध माना।
- Written By: अक्षय साहू
Shankaracharya Dispute: शंकराचार्य पद को लेकर चल रहा विवाद फिर सुर्खियों में है। खुद को ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य बताने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और कई राजनीतिक हस्तियों के बयानों के बाद यह मुद्दा गरमा गया है। नवभारत ने अखिल भारतीय संत समिति के स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती से इस विवाद पर बात की और इतिहास को समझने की कोशिश की। स्वामी जितेंद्रानंद ने बताया कि गढ़वाल राज्य में एक घटना के कारण तत्कालीन शंकराचार्य पीठ छोड़ गए थे, जिसके बाद लगभग 165–170 वर्षों तक पीठ शंकराचार्य विहीन रही। 1941 में भारत धर्म महामंडल के अध्यक्ष, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय और अन्य प्रमुख संतों के आग्रह पर पूज्यपाद स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती ने इस पीठ का संचालन संभाला। वे उस समय के सबसे प्रखर सन्यासी थे, जिनके शिष्यों में धर्म सम्राट करपात्री जी, स्वामी अखंडानंद, स्वामी ब्रह्मलिंग, स्वामी शांतानंद, स्वामी विष्णु देवानंद और महर्षि महेश योगी जैसे नाम शामिल थे। स्वामी ब्रह्मानंद ने अपनी वसीयत में 1953 में स्वामी शांतानंद को शंकराचार्य नियुक्त किया। इस नियुक्ति को चुनौती दी गई, लेकिन सिविल कोर्ट, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने शांतानंद जी को ही शंकराचार्य मान्यता दी। 1973 में कृष्ण मोढ़ाश्रम जी के निधन के बाद स्वरूपानंद जी ने मुकदमे में अपना नाम दर्ज कराया। उस समय की कांग्रेस सरकार ने भारत साधु समाज का अध्यक्ष बनाकर शंकराचार्य परंपरा में विवाद खड़ा किया।
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Swami jitendranand reveals true history of shankaracharya controversy
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