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Uttar Pradesh Politics: उत्तर प्रदेश की फिजाओं से सर्द मौसम अभी रुखसत नहीं हुआ है। लेकिन माघ मेला के दौरान संगम तट से उठी एक चिंगारी ने सूबे का सियासी पारा चढ़ा रखा है। इस चिंगारी ने एक तरफ राजनैतिक शोले भड़का रखे हैं तो दूसरी तरफ राज्य की भाजपा सरकार के अंदर पड़ी हुई दरार को सामने ला दिया है। क्योंकि राज्य के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य का एक और बड़ा बयान सामने आ गया है।
दरअसल, मौनी अमावस्या के दिन ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को पालकी से संगम तट पर स्नान के लिए जाने से रोका गया। प्रशासन, पुलिस और शंकराचार्य के शिष्यों की बीच झड़प हुई। कथित तौर पर पुलिस ने शंकराचार्य के शिष्यों को शिखा पकड़कर घसीटा और उन्हें टेंट के अंदर ले जाकर मारा गया।
इस घटनाक्रम के बाद शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद धरने पर बैठ गए। विपक्षी दलों के भी इस में अवसर मिल गया। सभी शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में आ गए। सपा मुखिया और सूबे के पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने तो शंकराचार्य को फोन कर हाल भी जाना और आकर मुलाकात की बात भी की।
जब विपक्ष ने शंकराचार्य के मुद्दे पर योगी आदित्यनाथ सरकार और भारतीय जनता पार्टी को घेरना शुरू किया तो माघ मेला प्रशासन ने अपने नंबर बढ़ाने के लिए या फिर ऊपरी आदेश पर अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य होने को फर्जी करार देते हुए एक के बाद एक दो नोटिस भेज दिए। जिनका शंकराचार्य ने जवाब भी दे दिया।
विवाद जब और गहराया तो उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य सामने आए और कहा, ‘शंकराचार्य जी हमारे लिए पूज्यनीय और आराध्य है। हम उनके चरणों में प्रणाम करते हैं और यह आग्रह करते हैं कि वह संगम में स्नान करें और इस विवाद को यहीं पर खत्म करें।
केशव प्रसाद मौर्य के इस बयान पर जब शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की प्रतिक्रिया ली गई तो उन्होंने कहा, वह मामले का पटाक्षेप चाहते हैं, इसका मतलब उन्हें पता है कि उनके अधिकारियों से गलती हुई है। यह उनका समझदारी भरा बयान है। ऐसे व्यक्ति को तो मुख्यमंत्री होना चाहिए।
शंकराचार्य की तरफ से यह सुनकर केशव प्रसाद मौर्य और गदगद हो गए। कहीं न कहीं उनकी दबी हुई इच्छा को एक हिलोरा मिल गया। अब वह लगातार उन्हें पूज्यनीय और सम्माननीय बताते हुए स्नान करने का आग्रह कर रहे हैं। इसी कड़ी में उन्हों एक बार फिर कहा कि वह पूज्यनीय हैं, सरकार और पार्टी उनका सम्मान करती है। उन्हें स्नान करके इस विवाद को समाप्त करना चाहिए।
केशव प्रसाद मौर्य का यह बयान सामने आते ही फिर से सियासत तेज हो गई है। राजनैतिक गलियारों में यह सवाल कुलांचे भरने लगा है कि यदि सरकार और पार्टी अविमुक्तेश्वरानंद का सम्मान करती है, हम उनका सम्मान करते हैं। तो क्या सिर्फ सीएम योगी आदित्यनाथ उनका निरादर करने पर अड़े हुए हैं?
दूसरा सवाल यह कि सरकार सम्मान करती है तो शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से मिलकर इस उन्हें स्नान के लिए मनाकर इस मसले को हल क्यों नहीं किया जा रहा है, केशव प्रसाद मौर्य बयानों के जरिए माहौल बनाने के बजाय स्वयं ऐसा क्यों नहीं कर रहे हैं? तीसरा और सबसे बड़ा सवाल यह कि पार्टी शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का सम्मान करती है कहते हुए सारा दोष सीएम योगी पर मढ़कर उन्हें किनारे लगाने की कोशिश तो नहीं की जा रही है?
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फिलहाल यह तीन सवाल उत्तर प्रदेश के साथ-साथ देश के सियासी हलकों में चर्चा का विषय बन चुके हैं। लेकिन इनका सही जवाब किसी के पास नहीं है। इन सवालों के जवाब जानने के लिए हमें वक्त को थोड़ा और वक्त देना होगा और देखना होगा कि आगे क्या कुछ होता है।