'पत्नी का पैकेज 11 लाख, फिर भी देना होगा गुजारा भत्ता', हाई कोर्ट ने पति को क्यों दिया ऐसा आदेश?

Allahabad High Court में मामले की सुनवाई के दौरान पति ने कहा कि पत्नी की सालाना आय लगभग 11 लाख रुपये से अधिक है। उसने कहा कि जब पत्नी पहले से ही 11 लाख सालाना कमा रही है तो किस बात का गुजारा भत्ता।
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इलाहाबाद हाई कोर्ट (सोर्स- सोशल मीडिया)
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Allahabad High Court News: उत्तर प्रदेश में एक दंपति के तलाक के बाद पत्नी ने गुजारा भत्ता मांगा, और फैमिली कोर्ट ने पति को हर महीने ₹15,000 देने का आदेश दिया। पति ने इस आदेश को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा, यह तर्क देते हुए कि पत्नी पहले से ही सालाना ₹11 लाख कमा रही है, इसलिए उसे कोई गुजारा भत्ता नहीं मिलना चाहिए।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, याचिका रविंद्र सिंह बिष्ट ने दाखिल की थी और मामला जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ के सामने आया। बिष्ट के वकील ने कहा कि पत्नी पढ़ी-लिखी और आर्थिक रूप से सक्षम हैं।

हाई कोर्ट में क्या बहस हुई?

हालांकि पत्नी की ओर से पेश दलीलें पति के तर्क को खारिज कर देती हैं। महिला के वकील ने बताया कि पति का वास्तविक पैकेज लगभग ₹40 लाख सालाना है, जबकि उसने कोर्ट में केवल ₹11 लाख सालाना बताया। इसे साबित करने के लिए पत्नी ने ट्रायल कोर्ट में दर्ज पतिक बयान पेश किया, जिसमें पति ने स्वीकार किया कि अप्रैल 2018 से अप्रैल 2020 तक वह एक कंपनी में काम कर रहा था और उसे सालाना लगभग ₹40 लाख मिलते थे।

अदालत ने क्यों नहीं मानी पति की दलील?

पति ने यह भी दावा किया कि पत्नी ने अपनी मर्जी से घर छोड़ा, वैवाहिक जिम्मेदारियां नहीं निभाईं और वह उसके बुजुर्ग माता-पिता के साथ रहने को तैयार नहीं थी। साथ ही कहा कि उसे अपने बीमार माता-पिता की देखभाल के लिए नौकरी छोड़नी पड़ी और उस पर आर्थिक बोझ है।

हालांकि हाई कोर्ट ने इन दलीलों को गुजारा भत्ता रोकने के लिए पर्याप्त नहीं माना। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि पति की वास्तविक आय और वित्तीय स्थिति को देखते हुए पत्नी को भत्ता मिलना उचित है।

कोर्ट ने क्या कहा?

इस मामले ने स्पष्ट किया कि केवल पत्नी की कमाई ही नहीं, बल्कि पति की असली आर्थिक स्थिति भी गुजारा भत्ता तय करने में अहम भूमिका निभाती है। हाई कोर्ट ने यह नज़ीर पेश करने वाला फैसला दिया कि पति की छुपाई गई कमाई को देखते हुए, पत्नी का भत्ता रोकना न्यायसंगत नहीं है। कुल मिलाकर, अदालत ने यह रुख अपनाया कि तलाक के बाद भी आर्थिक जिम्मेदारी पूरी करनी होगी, भले ही पत्नी आर्थिक रूप से सक्षम क्यों न हो।

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