मोदी-शाह के गले की फांस बने UGC के नए नियम! एक साथ कई भाजपाइयों ने छोड़ी पार्टी, BJP में मचा भारी कोहराम

BJP officials resignation over UGC New Rules: उत्तर प्रदेश में बीजेपी को बड़ा झटका लगा है। लखनऊ में बीजेपी के ग्यारह पदाधिकारियों ने नए यूजीसी नियमों के विरोध में इस्तीफा दे दिया है।
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UGC new rules controversy: उत्तर प्रदेश में बीजेपी को बड़ा झटका लगा है। लखनऊ में बीजेपी के ग्यारह पदाधिकारियों ने नए यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) नियमों के विरोध में इस्तीफा दे दिया है। जिला बीजेपी के कुम्हरावां मंडल के मंडल महासचिव अंकित तिवारी ने यूजीसी कानून के विरोध में अपने सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है।

अंकित तिवारी के साथ कुम्हरावां मंडल के 10 अन्य पदाधिकारियों ने भी सामूहिक इस्तीफा दे दिया है। यह मामला 169 बख्शी का तालाब विधानसभा क्षेत्र के कुम्हरावां मंडल का है, जिससे पार्टी के अंदरूनी कलह की चिंताएं बढ़ गई हैं। कार्यकर्ताओं ने पार्टी पर अपने मूल सिद्धांतों से भटकने का आरोप लगाया है। इससे पहले बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट ने भी इस्तीफा दे दिया है।

अंकित ने इस्तीफे में क्या लिखा?

जिला अध्यक्ष को लिखे अपने इस्तीफे में अंकित तिवारी ने साफ तौर पर कहा है कि पार्टी अपने मार्गदर्शक पंडित दीन दयाल उपाध्याय और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा तय किए गए उद्देश्यों से भटक रही है। तिवारी ने यूजीसी कानून को लागू करने के फैसले को पार्टी के वरिष्ठ अधिकारियों का 'विनाशकारी कदम' बताया, जो भविष्य के लिए हानिकारक है। अंकित तिवारी ने कहा कि उनकी विचारधारा का मिशन खोखला होता जा रहा है। इसलिए वह अपने पद से इस्तीफा दे रहे हैं और किसी भी पार्टी कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लेंगे।

BJP के गले की फांस बने नए नियम

इन सामूहिक इस्तीफों के चलते यूजीसी के नए नियमों को पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह के गले की फांस माना जा रहा है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी के नए बॉस नितिन नबीन के लिए नई चुनौती करार भी दिया जा रहा है।

यूजीसी के नए नियमों में क्या है?

यूजीसी ने 15 जनवरी 2026 से पूरे देश में नए नियम लागू किए हैं। इसका मुख्य उद्देश्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भेदभाव को खत्म करना है। यूजीसी यह सुनिश्चित करना चाहता है कि किसी भी छात्र के साथ उसकी जाति, लिंग या पृष्ठभूमि के कारण दुर्व्यवहार न हो। ये नए नियम 2012 के पुराने नियमों की जगह लेंगे। यूजीसी का कहना है कि पुराने नियम पुराने हो गए थे, इसलिए उन्हें और सख्त और स्पष्ट बनाया गया है ताकि हर छात्र को समान सम्मान मिले। नए नियमों के अनुसार, अब हर संस्थान, चाहे वह सरकारी कॉलेज हो या प्राइवेट यूनिवर्सिटी के लिए एक इक्विटी सेल बनाना अनिवार्य होगा। अगर किसी छात्र को लगता है कि उसके साथ भेदभाव हुआ है तो वह वहां शिकायत दर्ज करा सकता है। संस्थान को इस पर तुरंत कार्रवाई करनी होगी।

नए नियमों का विरोध क्यों हो रहा?

नए नियमों में ओबीसी को भी 'जाति-आधारित भेदभाव' की श्रेणी में शामिल किया गया है। सामान्य वर्ग के कई लोगों और छात्रों का मानना ​​है कि चूंकि ओबीसी को पहले से ही आरक्षण जैसे फायदे मिलते हैं, इसलिए उन्हें इस श्रेणी में शामिल करना अन्य छात्रों के साथ अन्याय होगा।

नियमों के गलत इस्तेमाल का डर

सोशल मीडिया यूजर्स का एक बड़ा वर्ग कह रहा है कि हमारे विश्वविद्यालय पहले से ही वर्ल्ड रैंकिंग में पीछे हैं। इसलिए सरकार को नए नियमों से विवाद पैदा करने के बजाय शिक्षा की क्वालिटी सुधारने पर ध्यान देना चाहिए। कुछ लोगों को डर है कि इन नियमों का गलत इस्तेमाल हो सकता है।

दूसरी तरफ स्टूडेंट्स का कहना है कि झूठी शिकायतों पर कार्रवाई करने का कोई प्रावधान नहीं है। इसका मतलब है कि बिना किसी सबूत के किसी पर भी झूठा आरोप लगाया जा सकता है। इससे किसी भी स्टूडेंट को परेशानी होगी और उनकी पढ़ाई और करियर पर बुरा असर पड़ेगा।

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