

Allahabad High Court Judgment On SC ST Act: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि केवल जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर देना अपने आप में इस कानून के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि यह साबित होना जरूरी है कि आरोपी ने संबंधित व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर अपमानित या नीचा दिखाने की मंशा से ऐसा किया था।
न्यायमूर्ति संतोष राय की एकलपीठ ने बरेली के इज्जतनगर थाने में दर्ज मामले में दो आरोपियों के खिलाफ जारी समन आदेश को रद्द कर दिया। मामले में हिम्मत सिंह के साथ उसके पिता बेगराज सिंह और भाई दौलत को भी नामजद किया गया था। पुलिस विवेचना के बाद केवल हिम्मत सिंह के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया, जबकि बेगराज और दौलत को क्लीनचिट दे दी गई थी।
अदालत ने पीड़ित के बयान के आधार पर तीनों के खिलाफ बीएनएस की धारा 358 के तहत समन जारी किया था। इसे आरोपियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। अदालत ने पाया कि पीड़ित ने अपने शुरुआती बयानों में बेगराज और दौलत की कोई विशिष्ट भूमिका नहीं बताई थी। मुख्य आरोप हिम्मत सिंह पर ही लगाए गए थे।
हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामले में किसी व्यक्ति को केवल सामान्य या अस्पष्ट आरोपों के आधार पर समन नहीं किया जा सकता। इसके लिए अदालत के सामने ठोस और पर्याप्त साक्ष्य होना आवश्यक है।
एक अन्य मामले में हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पुलिस विवेचना के बाद केवल गैर-संज्ञेय अपराधों में चार्जशीट दाखिल करती है तो उसे शिकायत यानी परिवाद के रूप में माना जाएगा। अदालत ने इसी आधार पर हसनपुर निवासी वसीम की याचिका स्वीकार करते हुए न्यायिक मजिस्ट्रेट के संज्ञान और समन आदेश को रद्द कर दिया।