कागजों पर एक्शन, जमीन पर सेटिंग! नागपुर में अवैध निर्माण पर हाईकोर्ट की सख्ती के बाद भी नहीं जागा मनपा प्रशासन

Nagpur Illegal Buildings: नागपुर मनपा ने 200 अवैध इमारतों की सूची जारी की है। महापौर नीता ठाकरे लगातार बैठकें ले रही हैं, लेकिन जमीनी कार्रवाई की धीमी रफ्तार से कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।
Mayor Neeta Thackeray takes a tough stance on illegal construction
अवैध निर्माण पर महापौर नीता ठाकरे सख्तसोर्स- सोशल मीडिया
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Nagpur Illegal Building Action: नागपुर मनपा ने पिछले दिनों 200 अवैध इमारतों की लिस्ट जारी की है। अवैध निर्माण पर महापौर नीता ठाकरे विशेष प्रयास कर रही हैं। बैठक पर बैठक ले रही हैं, परंतु सच्चाई यह है कि उनके अधिकारी उन्हें ही 'उलझा' कर रख दिए हैं। आंकड़े कुछ कहते हैं और हकीकत कुछ और। लिस्ट भले ही महापौर मैडम बना देती हैं लेकिन जमीनी कार्रवाई करा पाने में उनकी एक नहीं चलती क्योंकि अधिकारी 'माहिर' हैं।

उन्हें पता है कि अवैध संपत्तियों को कैसे उलझाये रखना है, ताकि उनका 'उल्लू' सीधा होता रहे। अधिकारियों की इसी रणनीति के आगे नेता नतमस्तक हो चुके हैं। शहर कराह रहा है और हाई कोर्ट सख्ती दिखा रहा है। परंतु इन सब बातों का कोई भी असर अधिकारियों पर नहीं पड़ रहा है।

तमाम आदेश हवा हवाई

आश्चर्य की बात तो यह है कि मनपा के आला अधिकारियों के आदेश को भी ये 'हवा' में इस प्रकार उड़ा देते हैं जैसे कुछ हुआ ही नहीं है। आला अधिकारी स्पष्ट रूप से भी बोल दें कि 'अमुक' अवैध निर्माण को गिरा दिया जाए तब भी वह अवैध निर्माण नहीं गिर पाता है। उनके अधीनस्थ चल रहे विभिन्न विभाग के उच्च अधिकारी 'अपना मत' इस प्रकार से लिखते हैं कि दूसरे विभाग पर निर्णय लेने की नौबत आ जाती है, फिर दूसरा विभाग इस प्रकार 'अभिप्राय' लिखता है कि तीसरे विभाग से अभिप्राय लेने की नौबत आ जाती है।

अवैध निर्माण वहीं का वहीं खड़ा रहता है लेकिन इसका 'अभिप्राय' देने का काम खत्म ही नहीं होता। कोई भी विभाग स्पष्ट संकेत या निर्देश देता ही नहीं है क्योंकि सभी का 'स्वार्थ' उसमें निहित होता है। इस बीच सर्वोच्च अधिकारी पूरी तरह से विचलित हो जाता है, खुमार निकालता है। बावजूद कुछ नहीं होता। ऐसे में महापौर की मीटिंग का कोई औचित्य ही नजर नहीं आता।

अग्निशमन विभाग उससे भी आगे

अग्निशमन विभाग खुद को आयुक्त के अधीन मानता ही नहीं है। विभाग के नियम अलग हैं और चाल भी। अवैध बिल्डिंगों में भी फायर फाइटिंग सिस्टम लग गया तो विभाग हाथ खड़ा कर लेता है। सिस्टम लगाने के पहले अधिकारी यह भी नहीं सोचते की 'अमुक' बिल्डिंग को मंजूरी मिली है या नहीं। विभाग के अधिकरी प्रमाणपत्र जारी कर देते हैं।

'बी' फॉर्म भरने वाले को मानो 'जीवनदान' दे दिया जाता है, जबकि अवैध निर्माण वाली बिल्डिंगों से आम जनता को जान का खतरा बना रहता है। परेशानियों से वे त्रस्त हो जाते हैं। परिवहन से लेकर सीवर तक की समस्या खड़ी होती है परंतु अधिकारी आंख बंद किए सब देखते रहते हैं।

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80 फीसदी बिल्डिंग अवैध

एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि शहर में इस वक्त 80 फीसदी इमारत बिना नक्शे और बिना मंजूरी के बने हुए है। कई बड़े-बड़े होटल, मॉल, लॉन्स, आवासीय इमारतों में भी मनधा के नियमों का पालन नहीं हो रहा है। यह बात नगर रचना, अग्निशमन विभाग, जोन कार्यालय को भी मालूम है, बावजूद वे कुछ नहीं करते हैं।

नगर रचना विभाग यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लेता है कि सर्वे करना उसका काम नहीं है, उसका काम नक्शा मंजूर करना है। लेकिन एक बात वह भूल जाता है कि नक्शे के अनुसार काम हो रहा है या नहीं यह देखना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। प्लिंथ लेबल पर ही अगर जांच कर ली जाए तो 90 फीसदी समस्या का समाधान हो जाए, परंतु विभाग के अधिकारी ऐसा करते नहीं है।

53-54 का नोटिस भी कागजी

वैसे तो कागजों में एमआरटीपी एक्ट की धारा 53-54 को काफी अहम माना जाता है। पर्याप्त सबूत जमा करने, सुनवाई करने, अवैध बिल्डिंग मालिक को मौका देने के बाद उक्त नोटिस जारी होता है लेकिन अधिकारियों की अपनी दिलचस्पी होने के कारण यह मजबूत धारा भी 'बौना' बन जाती है।

महीनों-महीनों तक सुनवाई होने के बाद भी नोटिस के बाद कार्रवाई नहीं होती। कार्रवाई क्यों नहीं होती? इसका सीधा उत्तर जोन के सहायक आयुक्त और उनके अधीन काम करने वाले इंजीनियर ही दे सकते हैं क्योंकि इन धाराओं को 'बौना' बनाने और 'मजाक' उड़ाने का मौका इन्हीं अधिकारियों ने दिया है।

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