कल्याण सिंह
Kalyan Singh Birth Anniversary: उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को ‘बाबूजी’ के नाम से जाना जाता था। करीब तीन दशक पहले, अयोध्या में हुए विवादित ढांचा विध्वंस के बाद कल्याण सिंह एक प्रमुख हिंदू नेता के रूप में उभरे थे। कल्याण सिंह का जन्म 5 जनवरी 1932 को अलीगढ़ के मढ़ौली गांव में तेजपाल सिंह लोधी और सीता देवी के घर हुआ था। राजनीति में कदम रखने से पहले उन्होंने एक अध्यापक के तौर पर करियर की शुरुआत की थी।
बाद में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़कर समाजसेवा के क्षेत्र में सक्रिय हो गए, और यहीं से उनकी राजनीति की शुरुआत हुई। 1967 में उन्होंने पहली बार अलीगढ़ की अतरौली सीट से विधायक के तौर पर चुनाव लड़ा और सफल हुए। इसके बाद 2002 तक उन्होंने 10 बार विधानसभा सदस्य के रूप में कार्य किया।
आपातकाल के दौरान उन्हें 20 महीने जेल में रहना पड़ा। 1977 में जब मुख्यमंत्री राम नरेश यादव के नेतृत्व में जनता पार्टी सरकार बनी, तो उन्हें स्वास्थ्य मंत्री का पद सौंपा गया। यहीं से उनकी प्रशासनिक समझ और राजनीतिक पकड़ मजबूत हुई।
कल्याण सिंह राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख नेता
1990 के दशक में कल्याण सिंह राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख नेता के रूप में उभरे। 1991 के विधानसभा चुनाव में उनके नेतृत्व में भाजपा ने पूर्ण बहुमत हासिल किया, और जून 1991 में वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचे के विध्वंस के बाद उन्होंने उसी दिन मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उस दिन पूरा देश हिल गया था, और लखनऊ से दिल्ली तक फोन की घंटियां बज रही थीं, हर कोई यह जानना चाहता था कि अयोध्या में यह घटना अचानक कैसे घटित हुई।
बताया जाता है कि जब अयोध्या में यह घटनाक्रम हुआ, तब कल्याण सिंह अपने सरकारी आवास पर थे। घटना के बाद उन्होंने पूरी जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। लेखक हेमंत शर्मा अपनी किताब ‘अयोध्या के चश्मदीद’ में बताते हैं कि कल्याण सिंह ने अधिकारियों को स्पष्ट आदेश दिया था कि किसी भी हालत में कारसेवकों पर गोली नहीं चलाई जाए। उनके अनुसार, उन्होंने कहा था, “मैं इसकी जिम्मेदारी खुद लेता हूं।” कल्याण सिंह ने लिखा हुआ आदेश दिया था कि विवादित ढांचे पर मौजूद कारसेवकों पर गोली नहीं चलानी है, और इसके लिए किसी अधिकारी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
कल्याण सिंह
कल्याण सिंह 1997 में दोबारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, लेकिन यह कार्यकाल केवल दो साल चला। इसके बाद वे राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल भी रहे। अपने मतभेदों के कारण उन्होंने भाजपा छोड़कर अपनी पार्टी बनाई। 2004 में वह भाजपा में लौटे, लेकिन 2009 में पार्टी में उपेक्षा और अपमान का आरोप लगाते हुए उन्होंने फिर से भाजपा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। लोग उन्हें ‘बाबूजी’ के नाम से आदर से पुकारते थे।
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सितंबर 2019 में उन पर विवादित ढांचे को ध्वस्त करने की आपराधिक साजिश के आरोप में मुकदमा चला। 2020 में सीबीआई की विशेष अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। 21 अगस्त 2021 को उनका निधन हो गया, और उनके निधन के एक साल बाद 2022 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।