पहली बार देश में SC ने दी इच्छामृत्यु की इजाजत, इसको लेकर क्या हैं नियम? यहां जानें सबकुछ
Euthanasia Case: सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से बिस्तर पर पड़े युवक हरीश राणा को इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी है। ऐसे में सवाल उठता है कि इच्छामृत्यु क्या होती है, इसे कब मांगा जाता है?
- Written By: अर्पित शुक्ला
सांकेतिक तस्वीर (Image- Social Media)
What Is Euthanasia: यूपी के गाजियाबाद के एक दंपति ने अपने बेटे हरीश राणा के लिए सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु की मांग की थी। हरीश पिछले करीब 12 सालों से कोमा में हैं। मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उनके ठीक होने की कोई संभावना नहीं है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के वी विश्वनाथन की बेंच ने इस पर फैसला सुनाया। ऐसे में सवाल उठता है कि इच्छामृत्यु क्या होती है, इसे कब मांगा जाता है और भारत में इससे जुड़ा कानून क्या कहता है।
इच्छामृत्यु क्या है?
जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक असहनीय पीड़ा या गंभीर बीमारी से जूझ रहा हो और उसके ठीक होने की उम्मीद बहुत कम हो, तब उसके परिवार या कभी-कभी स्वयं मरीज की इच्छा पर जीवन समाप्त करने की प्रक्रिया को इच्छामृत्यु कहा जाता है। इसका उद्देश्य मरीज को लंबे दर्द और कष्ट से मुक्ति दिलाना होता है।
आमतौर पर इच्छामृत्यु दो तरह की मानी जाती है
1. एक्टिव यूथेनेशिया (Active Euthanasia): इसमें मरीज को ऐसी दवा या इंजेक्शन दिया जाता है जिससे उसकी मृत्यु हो जाए।
सम्बंधित ख़बरें
आज की ताजा खबर 09 अगस्त: लखनऊ: CM योगी के नेतृत्व में आज से तिरंगा यात्रा का होगा शुभारंभ
सुप्रीम कोर्ट पहुंची JPSC परीक्षा धांधली की गूंज, CBI जांच और पेपर रद्द करने की मांग वाली याचिका दाखिल
10 साल से नहीं कटवाए बाल, उत्तराखंड की रेनू धरियाल ने बनाया वर्ल्ड रिकॉर्ड; जानें कितनी है बालों की लंबाई
अभिषेक बनर्जी फिर पहुंचे SC; कलकत्ता HC के फैसले को देंगे चुनौती; विदेश में आंखों के इलाज के लिए लगाई गुहार
2. पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia): इसमें मरीज का इलाज बंद कर दिया जाता है या लाइफ सपोर्ट, जैसे वेंटिलेटर, हटा दिया जाता है। इसके बाद कुछ समय में मरीज की मृत्यु हो जाती है।
भारत में क्या कहता है कानून?
भारत में इच्छामृत्यु पूरी तरह से कानूनी नहीं है, लेकिन कुछ खास परिस्थितियों में पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी जा सकती है। इस विषय पर पहले भी कई मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे हैं। नर्स अरुणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु देने से इनकार किया था, लेकिन इस फैसले में यह स्पष्ट किया गया कि बेहद दुर्लभ परिस्थितियों में इसकी अनुमति दी जा सकती है और इसके लिए विस्तृत दिशानिर्देश भी तय किए गए।
यह भी पढ़ें- मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा बयान, कहा- बराबरी का एक रास्ता अब UCC….
इन दिशानिर्देशों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक कोमा में हो और केवल लाइफ सपोर्ट पर जीवित हो, तो डॉक्टरों की एक मेडिकल बोर्ड रिपोर्ट तैयार करती है। इसके आधार पर संबंधित अदालत यह तय कर सकती है कि मरीज को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी जाए या नहीं। इस तरह भारत में इच्छामृत्यु से जुड़े मामलों में अदालत और मेडिकल विशेषज्ञों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।
