नवभारत संपादकीय:महिला आरक्षण पर सियासी संग्राम, परिसीमन से जोड़ने की रणनीति पर विपक्ष का पलटवार
Women Reservation Debate: महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने पर विवाद तेज है। विपक्ष ने सरकार की रणनीति पर सवाल उठाते हुए 2023 के कानून को लागू करने की मांग की।
- Written By: अंकिता पटेल
महिला आरक्षण बिल( सोर्स: सोशल मीडिया )
Women Reservation Delimitation Controversy: महिला आरक्षण के मुद्दे को परिसीमन से जोड़ने का केंद्र सरकार म का दांव विपक्ष ने विफल कर दिया। विपक्ष की दलील थी कि महिला आरक्षण बिल तो पहले ही 2023 में 106 वें संविधान संशोधन के जरिए पारित हो चुका है।
यह अधिनियम कानून के रूप में सरकारी राजपत्र में अधिसूचित हो चुका है, लेकिन यह तभी लागू होगा जब अगली जनगणना पूरी हो जाए, कांग्रेस की दलील है कि वह हमेशा महिला आरक्षण के समर्थन में है लेकिन जिस तरीके से सरकार यह बिल लाई है उसका पार्टी समर्थन नहीं कर सकती।
यदि सरकार 2023 का बिल छोटे बदलाव के साथ लाए तो तुरंत पारित करवा दिया जाएगा। विपक्ष का तर्क है कि किसी भी पार्टी ने लोकसभा की सीटें 50 प्रतिशत बढ़ाने की मांग नहीं की थी।
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यदि 543 सदस्यों का सदन बढ़ाकर 815 कर दिया जाए तो बहुत भीड़ बढ़ जाएगी और सदस्य अपना योगदान नहीं दे पाएंगे। इसमें महिला सीटें वर्तमान 181 से बढ़कर 272 हो जाएगी।
इससे हर राज्य के सांसदों की संख्या तो बढ़ेगी लेकिन ताकत उतनी ही रहेगी। महिला आरक्षण और परिसीमन (चुनाव क्षेत्र की पुनर्रचना) दोनों मुद्दे अलग- अलग हैं। 12 वर्षों में पहली बार मोदी सरकार की नारी वंदन बिल पर संसद में हार हुई है क्योंकि भरपुर कोशिशों के बावजूद वह 131 वें संविधान संशोधन बिल पर दो तिहाई बहुमत नहीं जुटा पाई।
विपक्ष ने एकजुटता दिखाते हुए बिल के खिलाफ मतदान किया। कुल 528 सांसदों ने वोट डाले जिनमें 298 वोट पक्ष में तथा 230 बोट विपक्ष में पड़े। दो तिहाई बहुमत के लिए 352 मतों की जरूरत श्री जो नहीं मिले। इस प्रकार 54 वोटों से यह बिल गिर गया। बीजेपी अपनी इस किरकिरी को बर्दाश्त नहीं कर पा रही है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि विपक्ष को अपनी गलती का अंजाम भुगतना होगा। उसने महिला आरक्षण बिल रोकने का जो पाप किया है, उसकी सजा जरूर मिलेगी। कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी व सपा जैसी पार्टियों की स्वार्थी राजनीति का नुकसान नारीशक्ति को उठाना पड़ा है।
दूसरी ओर प्रियंका गांधी ने कहा कि सरकार जो बिल लाई वह राजनीतिक मानचित्र बदलने के लिए परिसीमन से जुड़ी साजिश थी क्योंकि महिला आरक्षण बिल तो पहले ही 2023 में सर्वसम्मति से पारित हो चुका है। लोकसभा की सीटें बढ़ाने की जरूरत नहीं है।
बेहतर है कि जितनी सीटें अभी हैं उतनी ही रहें और उसमें महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण मिले। सरकार परिसीमन इस आधार पर करना चाहती थी जिसमें उसे जातिगत जनगणना के आंकड़ों को देखना जरूरी नहीं होता और उसे मनमानी करने की पूरी आजादी मिल जाती।
सरकार और विपक्ष के इस टकराव में अब और तीखापन आएगा क्योंकि इस महिला आरक्षण बिल की वजह से विपक्ष की एकजुटता देखने को मिली तो दूसरी ओर सरकार अपनी इस हार को पचा नहीं पा रही है।
बीजेपी खुद को महिलाओं की सबसे बड़ी हितैषी बताकर बिल पास नहीं होने के मुद्दे को भुनाएगी, प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, बीजेपी के सारे मंत्री व सांसद इसे लेकर कांग्रेस व इंडिया गठबंधन को दोषी ठहराते हुए जनता के बीच जाएंगे।
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यदि निष्पक्ष तौर पर विचार करें तो महिला आरक्षण से देश की कौन सी तस्वीर बदलेगी? नेताओं के परिवारों की महिलाएं ही इसका लाभ उठाएंगी, देश में हर वर्ष 30,000 महिलाओं से दुष्कर्म होता है जिनमें आधी बच्चियां हैं। रोज 17 महिलाओं की दहेज-हत्या होती है। प्रति वर्ष महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा के 4 लाख अपराध दर्ज किए जाते हैं।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
