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नवभारत विशेष: होर्मुज खुला या बंद, कोई सीधा जवाब नहीं; फायरिंग के बाद भारतीय जहाज वापस लौटे
US Israel Strategy: ट्रंप द्वारा नेतन्याहू की रणनीति पर भरोसा करने को लेकर विश्लेषण में सवाल उठे हैं। ईरान को लेकर गलत आकलन से मिडिल ईस्ट में तनाव और टकराव की आशंका बढ़ी।
- Written By: अंकिता पटेल

ट्रंप विदेश नीति( सोर्स: सोशल मीडिया )
Trump Netanyahu Iran War Plan: दरअसल, ट्रंप अपने इर्द-गिर्द ऐसे व्यक्तियों को रखना पसंद करते हैं, जो उनसे कम अक्लमंद हों व जिनकी उपलब्धियां उनसे कम हों। ट्रंप ने अपने अनुभवी सैन्य अधिकारियों के उचित सुझाव सुनने की बजाय नेतन्याहू की उन बातों को मान लिया जिन्हें पिछले 3 दशकों से अमेरिका का हर राष्ट्रपति सुनकर भी अनसुना कर रहा था।
नेतन्याहू का गेम-प्लान सीधा-सा था कि एक झटके में ईरान की टॉप लीडरशिप व सैकड़ों लोगों की हत्या कर देंगे, तो ईरानी अपनी ही सरकार के खिलाफ विद्रोह कर देंगे। अपनी मर्जी के शासक (पूर्व शाह का बेटा जो अमेरिका में रहता है) को तेहरान की गद्दी पर बिठा देंगे और ईरान के तेल पर कब्जा हो जाएगा।
इस सबमें सिर्फ 3-4 दिन लगेंगे। वेनेजुएला की अपनी कामयाबी में मस्त ट्रंप को नेतन्याहू की रणनीति मुमकिन लगी और तेहरान को काराकास समझने की भूल कर बैठे। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि ईरान जीसीसी देशों में उनके सैन्य बेसों पर हमला करेगा और स्ट्रेट ऑफ होमुंज को बंद कर देगा।
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ईरान ने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद कुशल योद्धा की तरह जंग लड़ी। उसने पहले अपने सस्ते ड्रोनों के हमलों से अमेरिका व इजराइल के महंगे इंटरसेप्टरों का जखीरा खत्म करा दिया और फिर कतर व अन्य अमेरिकी बेसों में लगे महंगे राडारों को नष्ट करके रक्षा व्यवस्था को ‘अंधा’ करने के बाद अपने शक्तिशाली मिसाइलों से अमेरिकी बेसों व इजराइल में कोहराम मचा दिया।
यह सब करने के लिए ईरान को रूस व चीन के जासूसी उपग्रहों से रियल टाइम में सूचनाएं मिल रही थी। रूस व चीन की मदद के बिना
ईरान अकेला अमेरिका के विश्व वर्चस्व को चुनौती दे ही नहीं सकता था।
जिस तरह से ईरान ने जीसीसी देशों में अमेरिका के 13 सैन्य अड्डों को नष्ट किया व अमेरिकी सैनिकों को होटलों में छुपने के लिए मजबूर किया, उससे अरबों को भी लग गया है कि अमेरिका उनको सुरक्षा नहीं कर सकता और उसकी प्राथमिकता इजराइल है, अरब नहीं। इसलिए सऊदी अरब ने अपने यहां 13,000 पाकिस्तानी सैनिक तैनात किए हैं।
इस पृष्ठभूमि में ट्रंप बुरी तरह से फंस चुके थे। वह न तो ईरान से समर्पण करा पा रहे थे और न होमुंज को खुलवा पा रहे थे। उन्होंने ईरान की सभ्यता को नष्ट करके उसे पाषण युग में पहुंचाने की धमकी दी। डोनाल्ड ट्रंप के इस आपत्तिजनक बयान का जबर्दस्त विरोध अमेरिका में भी हुआ और 80-90 लाख लोग ‘नो किंग’ का नारा लगाते हुए अमेरिकी सड़कों पर उतरे। ट्रंप के लिए अन्य परेशानियां भी खड़ी होने लगी थी।
उनकी रेटिंग सबसे निचले पायदान पर पहुंच गई, वह अपने एग्जीक्यूटिव ऑर्डर से जंग को सिर्फ 60 दिन ही चला सकते थे, जिसके बाद अमेरिकी संविधान के तहत संसद से मंजूरी लेना आवश्यक है।
यह भी पढ़ें:-नवभारत निशानेबाज: इस रिसर्च का आखिर क्या कहना, गाय के दूध में होता है सोना
ट्रंप के खिलाफ अनुच्छेद 25 लागू करने व महाभियोग चलाने की मांग भी निरंतर बढ़ती जा रही है और नवंबर के मध्यावधि चुनाव में उनकी पार्टी रिपब्लिकन पर हार का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। यूरोप के देश भी ट्रंप को अलग करके, अलग रणनीति बनाने लगे और 40 देशों ने अलग से बैठक करने की योजना बनाई।
फायरिंग के बाद भारतीय जहाज वापस लौटे
आखिरकार स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोल दिया गया और फिर बंद किया गया, भारतीय टैंकरों पर ईरानी गार्ड ने गोली चलाई, भारत ने ईरानी राजदूत को बुलाकर कहा कि उसके जहाजों की सुरक्षा महत्वपूर्ण है। वॉशिंगटन व तेहरान ने अपनी-अपनी तरह से होमुंज को खुला घोषित किया है।
लेख- विजय कपूर के द्वारा
Trump netanyahu iran strategy analysis us foreign policy middle east
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