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नवभारत संपादकीय: क्या कर्जमाफी किसानों को बचाएगी या सिर्फ बैंकों की बैलेंस शीट चमकाएगी?
- Written By: अंकिता पटेल
Farmer Debt Relief: किसान नेताओं का दावा है कि कर्जमाफी किसानों को संकट से बाहर नहीं निकालती, बल्कि बैंकों की बैलेंस शीट सुधारने का माध्यम बन जाती है। कई किसान तकनीकी कारणों से लाभ से वंचित रह जाते है

कर्जमाफी, किसान संकट, कृषि ऋण, (सोर्स: सोशल मीडिया)
India Farmer Loan Crisis: क्या कर्जमाफी किसानों को संकटमुक्त कर पाएगी ? किसान नेताओं का आरोप है कि यह योजना किसानों को कर्ज से मुक्ति प्रदान करने वाली न होकर बैंकों की बॅलेंस शीट साफ करने वाली है। बैंकों का डूबा कर्ज सरकारी कोष से भर दिया जाएगा। देश में कॉर्पोरेट कंपनियों को घाटा आने पर 67 प्रतिशत और कुछ मामलों में तो 79 से 90 प्रतिशत कर्ज छूट दी जाती है। 16 लाख करोड़ का कॉर्पोरेट कर्ज राइट ऑफ करने वाली व्यवस्था किसानों का 1 रुपया भी छोड़ने को तैयार नहीं है।
रिजर्व बैंक के नियमानुसार प्राकृतिक आपदा के बाद जिला बैंक के लिए पुराने कर्ज को पुनर्गठित कर नया फसल कर्ज देना बाध्यकारी है। वास्तव में यह नवीनीकरण सिर्फ कागज-पत्रों में होता है। नूतनीकरण में कर्ज की तारीख नई कर दी जाती है। इसलिए किसान बकायादार नहीं दिखाया जाता और कर्ज माफी के लिए अपात्र बताया जाता है। नियमित कर्ज अदा करने वाले को 50,000 रुपये के प्रोत्साहन के लिए 2025-26 व 2026-27 में नया कर्ज लेने की सख्ती है।
कर्जमाफी स्थायी समाधान नहीं, किसान अब भी कर्ज के दुष्चक्र में फंसे
कर्जमुक्त रहने की इच्छा रखने वाला किसान अपात्र ठहराया जाता है। कर्जबाजारी होना किसान की गलती नहीं है। यह घाटे में चलने वाली खेती का अपरिहार्य परिणाम है। एक फसल नहीं हुई तो पुराने कर्ज को अदा करने के लिए नया कर्ज लो। उसे चुकाने के लिए महाजन के घर जाओ और अपनी जमीन गिरवी रखो। यही दुष्ट चक्र है।
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इस मूल समस्या को कायम रखते हुए केवल कर्जमाफी घोषित की जाती है। यह चक्र पुनः वैसा ही चलता रहता है। पिछले 18 वर्षों में चौथी बार कर्जमाफी देना सिध्द करता है कि कर्जमाफी सिर्फ दर्द दूर करती है, यह उपचार नहीं है। फसल बीमा का पैसा मिल नहीं पाता। नुकसान भरपाई हो नहीं पाती। असिंचित जमीन वाला किसान साहूकार के जाल में फंस जाता है जो मनमाना ब्याज लगाता है और खेती हड़पना चाहता है।
किसानों के लिए दीर्घकालिक नीति की जरूरत
किसानों के बच्चों की शिक्षा, इलाज व शादी-ब्याह के लिए कर्ज लेना पड़ता है। देश के आधे से अधिक किसान कर्ज में डूबे हुए हैं। अल्प भूधारकों पर कर्ज का भार अधिक है। यह घाटे में चलने वाली खेती की वजह से है। विदर्भ-मराठवाडा के किसानों को हर तरफ से निराश होकर आत्महत्या करनी पड़ती है।
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2008 में केंद्र सरकार की कर्जमाफी, 2017 की छत्रपति शिवाजी महाराज योजना, 2019 की महात्मा फुले योजना के बाद अब 2026 में अहिल्याबाई होलकर योजना लागू हुई। इससे समस्या का स्थायी समाधान निकलना कठिन है। इस बारे में केरल की मिसाल सामने है। वहां 2006 में कानून बनाकर किसान कर्जमुक्ति आयोग (फार्मर्स डेट रिलीफ कमीशन) गठित किया गया। यह स्थायी अर्धन्यायिक आयोग संकटग्रस्त किसानों के आवेदन पर उनकी फसल हानि, आय का साधन, परिवार पर आई आपत्ति की जांच कर कर्ज में रियायत, ब्याजमाफी तथा वसूली स्थगित करने पर निर्णय लेता है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
Will farmer loan waiver end farmer debt relief crisis or clean bank balance sheets
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