
क्या सचमुच में गरीबों को बंट रहा अनाज (सौ. डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: एक ओर तो केंद्र सरकार बड़े पैमाने पर गरीबी दूर करने का दावा करती है वहीं दूसरी ओर देश के 80 करोड़ लोगों को मुफ्त खाद्यान्न देने की भी डींग हांकती है. यह कैसा विरोधाभास है? यदि भारत की आबादी के 57 फीसदी से ज्यादा लोग सरकार के दिए मुफ्त अनाज के भरोसे जीवित हैं तो फिर गरीबी कहां दूर हुई? यह दलील दी जा सकती है कि दोनों मुद्दे अलग-अलग हैं. इन्हें मिलाकर न देखा जाए. food या प्रशासनिक मशीनरी इसमें गोलमाल कर रही है।
श्रमिक वर्ग के अंगूठे व हथेली के निशान मिट जाते हैं इसलिए उनकी बायोमैट्रिक छाप अंकित नहीं हो पाती. सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि मुफ्त अनाज सिर्फ गरीबों को दिया जाना चाहिए न कि खरीद क्षमता रखनेवाले अन्य लोगों को मिलना चाहिए. देश की सबसे बड़ी अदालत की टिप्पणी है कि राशन कार्ड लोकप्रियता कार्ड बन गए हैं. जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने सरकारी मशीनरी के भ्रष्टाचार की ओर संकेत करते हुए कहा था कि हम केंद्र से गरीब के लिए 1 रुपया भेजते हैं तो उसे सिर्फ 15 पैसे मिल पाते हैं।
अब डिजिटाइजेशन, जनधन योजना, आधार व डीबीटी की वजह से सीधे हितग्राहियों के खाते में रकम पहुंचने लगी है. फिर भी लोग भ्रष्टाचार का रास्ता निकाल ही लेते हैं. मुफ्त राशन देकर बीजेपी ने यूपी के चुनाव में शानदार जीत हासिल की. गरीबी कम भी हो जाए तो भी मुफ्त की सौगात देना जारी रहता हैं क्योंकि सत्तापक्ष वोट खोना नहीं चाहता. भारत में केवल 4 प्रतिशत लोग आयकर अदा करते है. देश के अधिकांश मतदाता टैक्स का आधार बढ़ाने के खिलाफ हैं लेकिन मुफ्त की योजनाएं बढ़ाए जाने के पक्ष में हैं. रेवड़ियां किसे अच्छी नहीं लगतीं? एक बार कोई चीज मुफ्त में देना शुरू किया तो फिर उस योजना को बंद करना बेहद मुश्किल हो जाता है।
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कराधान की प्रणाली इसलिए है ताकि जनता से धन लेकर उसे सार्वजनिक भलाई व अन्य सेवाओं के लिए खर्च किया जाए. मुफ्त की योजनाएं जब अंधाधुंध बढ़ा दी जाती है तो सरकार के खजाने पर भार पड़ता है और उसे कर्ज लेने की नौबत आ जाती है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा






