नवभारत संपादकीय: एसआईआर विवाद में फंसा बंगाल, कैसा चुनाव जिसमें लाखों लोग वोटिंग से वंचित
Voter List Controversy: बंगाल चुनाव से पहले 91 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटा। SIR प्रक्रिया, दस्तावेजों की कमी और नामों की स्पेलिंग में बदलाव के कारण बड़ी संख्या में लोग मतदान से वंचित रह सकते हैं।
- Written By: अंकिता पटेल
Bengal Voter Deletion Issue( Source: Social Media )
Bengal Voter Deletion Issue: दो सप्ताह बाद होने वाले बंगाल विधानसभा चुनाव में लगभग 91 लाख लोग मतदान नहीं कर पाएंगे। यह सचमुच अभूतपूर्व व बेहद चिंताजनक स्थिति है, जो चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की वजह से निर्मित हुई है।
12 प्रतिशत मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। एसआईआर पूरा नहीं हो पाने से नई मतदाता सूची में इन लोगों का नाम नहीं आ पाया है। स्वयं को वोटर के रूप में योग्यता प्रमाणित करने की जिम्मेदारी लोगों पर डाल दी गई है।
सिर्फ 5 माह में नई मतदाता सूची तैयार करनी थी जो कि बंगाल जैसे घनी आबादी तथा विविध समुदायों वाले राज्य के लिए आसान काम नहीं था। साक्षरता की कमी तथा जरूरी दस्तावेजों का अभाव एक बड़ी रुकावट बन गया।
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इसके अलावा सरनेम की स्पेलिंग में बदलाव, एक पीढ़ी द्वारा मुखोपाध्याय, बंदोपाध्याय, चट्टोपाध्याय, वसु लिखना तथा दूसरी पीढ़ी द्वारा मुखर्जी, बनर्जी, चटर्जी, बोस लिखना आपत्ति की वजह बना। कंप्यूटर तकनीक ऐसे बदलाव स्वीकार नहीं करती।
मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए लोगों को फॉर्म भरना और फिर सुनवाई के लिए हाजिर होना था। इस तरह जटिलता व दबाव बढ़ा दिया गया। आरोप है कि एसआईआर में सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग, महिलाओं, ग्रामीणों को निशाना बनाया गया, ऐसे मुस्लिम भी चपेट में आ गए जो कभी पाकिस्तान या बांग्लादेश नहीं गए थे।
बंगाल की आबादी में 25 प्रतिशत से ज्यादा मुसलमान हैं। महिलाओं की 2024 के लोकसभा चुनाव में बड़ी भूमिका रही थी। वह बुनियादी जरूरते देखती हैं और खोखले वादों या राजनीतिक एजेंडा से प्रभावित नहीं होतीं
। यदि सरकार स्वास्थ्य, शिक्षा व रोजगार के मुद्दे पर ध्यान नहीं देती तो उसे हटाने के लिए ऐसे मतदाता अपने वोट रूपी हथियार का इस्तेमाल करते हैं। कितने ही लोग मतदान से भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं और बोट डालकर संतोष व गर्व महसूस करते हैं।
उन्हें लगता है कि मतदान के दिन अमीर-गरीब सब बराबर रहते हैं। उन्हें एक ही लाइन में खड़े रहकर वोट डालने का मौका मिलता है। मतदान ऐसा अधिकार है जिसे वह खोना नहीं चाहते।
एसआईआर के दौरान जिन लोगों ने फॉर्म भरे और सुनवाई में भी शामिल हुए, उनके भी नाम मतदाता सूची में नहीं आ पाए। बंगाल सरकार व मुख्य चुनाव आयुक्त के बीच टकराव की वजह से उत्पन्न तनाव में सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया लेकिन समय कम रहने से कुछ न्यायाधिकरण आखिर कितना काम कर पाते? इस चुनाव में समय पर सुनवाई नहीं होने से लाखों लोग अपना मतदान का अधिकार खो बैठे हैं।
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एसआईआर के बाद लगी फाइनल वोटर लिस्ट में चुनाव आयोग ने 90.66 लाख वोटर्स के नाम हटाए हैं। बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी ने कहा कि अब यदि न्यायाधिकरण किसी मतदाता का नाम सूची में शामिल करने की मंजूरी देता है तो उसे सूची में शामिल तो कर लिया जाएगा लेकिन वह इस चुनाव में मतदान नहीं कर पाएगा।
उसे अगले चुनाव में वोट डालने की अनुमति होगी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि अंतिम मतदाता सूची से विशेष समुदाय के लोगों के नाम हटाए गए हैं। यह लोकतांत्रिक अधिकारों के खिलाफ है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
