West Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 का पहला चरण सिर्फ औपचारिक शुरुआत नहीं, बल्कि पूरे चुनाव की दिशा तय करने वाला मोड़ बनता जा रहा है। 23 अप्रैल को उत्तर बंगाल और सीमावर्ती जिलों की 54 सीटों पर मतदान होना है, और यही वह इलाका है जिसने 2021 में भाजपा को सबसे बड़ी बढ़त दिलाई थी। उस चुनाव में भाजपा ने यहां 30 सीटें जीती थीं, जबकि टीएमसी 24 तक सीमित रह गई थी। हालांकि ममता बनर्जी ने दक्षिण बंगाल में मजबूत प्रदर्शन कर सत्ता बचा ली थी, लेकिन इस बार परिस्थितियां पहले से अलग नजर आ रही हैं। मतदाता सूची से नाम हटने के आरोप, सीमा सुरक्षा और घुसपैठ का मुद्दा, बढ़ता ध्रुवीकरण, स्थानीय असंतोष और टिकट वितरण को लेकर नाराजगी ये सभी कारक पहले चरण को बेहद संवेदनशील बना रहे हैं। यह सिर्फ सीटों का मुकाबला नहीं रह गया है, बल्कि चुनावी माहौल और नैरेटिव तय करने वाली लड़ाई बन चुका है। भाजपा के लिए उत्तर बंगाल हमेशा से सत्ता का प्रवेश द्वार रहा है, लेकिन इस बार उसकी स्थिति उतनी सहज नहीं दिखती। 2021 जैसी लहर फिलहाल नजर नहीं आ रही, खासकर मटुआ, राजवंशी और सीमावर्ती हिंदू वोटरों में उत्साह थोड़ा ठंडा पड़ा है। इसके साथ ही टिकट बंटवारे के बाद कई जगहों पर गुटबाजी और असंतोष सामने आया है। दिलचस्प बात यह है कि यह असंतोष खुली बगावत के रूप में कम और “साइलेंट रिबेलियन” के रूप में ज्यादा दिख रहा है यानी नेता पार्टी में रहते हुए ही अंदरखाने नुकसान पहुंचा सकते हैं।
West Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 का पहला चरण सिर्फ औपचारिक शुरुआत नहीं, बल्कि पूरे चुनाव की दिशा तय करने वाला मोड़ बनता जा रहा है। 23 अप्रैल को उत्तर बंगाल और सीमावर्ती जिलों की 54 सीटों पर मतदान होना है, और यही वह इलाका है जिसने 2021 में भाजपा को सबसे बड़ी बढ़त दिलाई थी। उस चुनाव में भाजपा ने यहां 30 सीटें जीती थीं, जबकि टीएमसी 24 तक सीमित रह गई थी। हालांकि ममता बनर्जी ने दक्षिण बंगाल में मजबूत प्रदर्शन कर सत्ता बचा ली थी, लेकिन इस बार परिस्थितियां पहले से अलग नजर आ रही हैं। मतदाता सूची से नाम हटने के आरोप, सीमा सुरक्षा और घुसपैठ का मुद्दा, बढ़ता ध्रुवीकरण, स्थानीय असंतोष और टिकट वितरण को लेकर नाराजगी ये सभी कारक पहले चरण को बेहद संवेदनशील बना रहे हैं। यह सिर्फ सीटों का मुकाबला नहीं रह गया है, बल्कि चुनावी माहौल और नैरेटिव तय करने वाली लड़ाई बन चुका है। भाजपा के लिए उत्तर बंगाल हमेशा से सत्ता का प्रवेश द्वार रहा है, लेकिन इस बार उसकी स्थिति उतनी सहज नहीं दिखती। 2021 जैसी लहर फिलहाल नजर नहीं आ रही, खासकर मटुआ, राजवंशी और सीमावर्ती हिंदू वोटरों में उत्साह थोड़ा ठंडा पड़ा है। इसके साथ ही टिकट बंटवारे के बाद कई जगहों पर गुटबाजी और असंतोष सामने आया है। दिलचस्प बात यह है कि यह असंतोष खुली बगावत के रूप में कम और “साइलेंट रिबेलियन” के रूप में ज्यादा दिख रहा है यानी नेता पार्टी में रहते हुए ही अंदरखाने नुकसान पहुंचा सकते हैं।