
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
नवभारत डिजिटल डेस्क: पिछले साल फरवरी में यूजीसी ने इन नियमों के मसौदा संस्करण को सार्वजनिक सुझावों के लिए जारी किया था, जिसमें ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) को जाति-आधारित भेदभाव के दायरे से बाहर रखा गया था और भेदभाव की परिभाषा अस्पष्ट थी। मसौदा नियमों में यह भी प्रस्ताव था कि भेदभाव की झूठी शिकायतों को ‘हतोत्साहित’ किया जाए और इसके लिए जुर्माने का प्रस्ताव रखा गया था।
लेकिन अंतिम अधिसूचित नियमों में यूजीसी ने ओबीसी को जाति-आधारित भेदभाव के दायरे में शामिल किया है और झूठी शिकायतों से संबंधित प्रावधान को हटा दिया गया है। साथ ही, ‘भेदभाव’ की परिभाषा को थोड़ा विस्तृत किया गया है, ताकि इसमें साल 2012 के विनियमों में शामिल कुछ बिन्दुओं को लिया जा सके।
इसके अतिरिक्त जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के लिए प्रत्येक परिसर में समानता समितियों (इक्वेलिटी कमेटी) के गठन को अनिवार्य कर दिया गया है। इनका पालन न करने पर संस्थान को डिग्री या कार्यक्रम प्रदान करने से रोकने जैसे दंड का सामना करना पड़ सकता है। जाति-आधारित भेदभाव का अर्थ यह है कि केवल जाति या जनजाति के आधार पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी के सदस्यों के खिलाफ किया गया भेदभाव है।
भेदभाव की परिभाषा किसी भी हितधारक के खिलाफ, चाहे प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष, केवल धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान, विकलांगता या इसमें से किसी भी आधार पर किया गया अनुचित, भिन्न या पक्षपातपूर्ण व्यवहार या ऐसा कोई भी कार्य भेदभाव के अंतर्गत शामिल किया जाएगा। अब सवाल यह है कि यूजीसी के इन नियमों को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं, विशेषकर सवर्ण वर्गों द्वारा? उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से आरंभ हुई इस कवायद ने राजनीतिक रंग ले लिया है।
इन नियमों को ‘काला कानून’ बताकर विरोध करने वालों का कहना है कि नए नियमों के तहत सामान्य वर्ग के छात्रों को आशंकित अपराधी करार दे दिया गया है। दूसरा तर्क यह कि ड्राफ्ट में झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के लिए जुर्माना या निलंबन करने का प्रावधान था, लेकिन अधिसूचित नियमों में इन प्रावधानों को हटा दिया गया है।
इसका अर्थ यह हुआ कि झूठी शिकायत करने वाले का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, लेकिन जिस सामान्य छात्र के खिलाफ झूठी शिकायत की गई हो उसका करिअर बर्बाद हो सकता है। संविधान के अनुच्छेद 19 व 21 के तहत सभी नागरिकों को स्वतंत्रता व समानता का अधिकार है। यूजीसी के नए नियम संविधान के इन प्रावधानों का खुला उल्लंघन हैं।
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लेकिन क्या इन नियमों को वापस लिया जाएगा या इनमें संशोधन होगा? एक ई-मेल अभियान के माध्यम से यूजीसी व शिक्षा मंत्रालय से इन नियमों को वापस लेने का आग्रह किया जा रहा है। यूजीसी अध्यक्ष विनीत जोशी की तरफ से अभी तक इस संदर्भ में कोई बयान जारी नहीं किया गया है।
जनवरी 2016 में तेलंगाना में रोहित वेमुला और मई 2019 में पायल ताडवी की आत्महत्या मामलों के बाद पीड़ित परिजनों ने 29 अगस्त 2019 को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करके जातीय भेदभाव की शिकायतों से निपटने के लिए कठोर नियम बनाने की मांग की थी।
इसके बाद यूजीसी ने एक ड्राफ्ट तैयार किया, जिसकी समीक्षा शिक्षा, महिला व युवा मामलों की संसदीय समिति ने की और 8 दिसंबर 2025 को अपनी सिफारिशें केंद्र सरकार को सौंपी। यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026 को 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किया गया था और 15 जनवरी 2026 से इसे लागू कर दिया गया। वह विनियम 2012 से लागू भेदभाव रोधी नियमों का संशोधित रूप है।
लेख-शाहिद ए चौधरी के द्वारा






