संपादकीय: शिक्षकों से क्यों करवाए जाते हैं अशैक्षणिक कार्य

Teachers Non Academic Duties: शिक्षकों पर चुनावी ड्यूटी, सर्वे और अन्य अशैक्षणिक कार्य थोपे जा रहे हैं। क्या यह बेगार नहीं? जानें कैसे इससे अध्यापन और शिक्षा व्यवस्था प्रभावित हो रही है।
शिक्षकों से क्यों करवाए जाते हैं अशैक्षणिक कार्य
शिक्षकों से क्यों करवाए जाते हैं अशैक्षणिक कार्य (सौ. डिजाइन फोटो)
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नवभारत डिजिटल डेस्क: अध्ययन व अध्यापन से जुड़े स्कूलों व कॉलेजों के शिक्षकों पर जबरन अशैक्षणिक कार्यों की जिम्मेदारी थोपी जाती है। इससे छात्रों को पढ़ाने का उनका मूल कर्तव्य प्रभावित होता है। दिल्ली के स्कूलों में शिक्षकों को जबाबदारी सौंपी गई है कि शाला के परिसर में आए आवारा कुत्तों को भगाएं। दिल्ली के शिक्षामंत्री आशीष सूद ने इस बात से इनकार करते हुए कहा कि शिक्षा विभाग का आदेश है कि कुत्ते भगाने के लिए एक केंद्रीय अधिकारी की नियुक्ति की जाए। शिक्षक को यह दायित्व नहीं दिया गया। जब शिक्षा विभाग के आदेश में ऐसा अधिकारी नियुक्त करने के लिए अलग से कोई प्रशासकीय व आर्थिक प्रावधान नहीं है तो ऐसी हालत में जिम्मेदारी शिक्षक पर ही आएगी।

वास्तव में सुप्रीम कोर्ट ने 7 नवंबर को आदेश दिया था कि शिक्षा संस्थाओं के प्रांगण में आनेवाले आवारा कुत्तों का बंदोबस्त किया जाए। कुछ दिनों पहले विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने सभी विश्वविद्यालयों व उच्च शैक्षणिक संस्थाओं को परिपत्रक जारी कर ऐसे केंद्रीय अधिकारी की व्यवस्था करने का आदेश दिया है। विद्यार्थियों, खासकर छोटे बच्चों पर आवारा कुत्तों के हमलों की घटनाएं देखते हुए यह आदेश दिया गया लेकिन साथ ही यह भी कहा गया कि यह काम करते समय प्राणी कल्याण नियम-कानूनों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए, मतलब कुत्ता भगाते समय पत्थर या डंडा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। यदि इसके लिए अलग से केंद्रीय अधिकारी नियुक्त करना है तो सेवा शर्तें, वेतन का प्रावधान, पद की आयु सीमा व कालावधि भी तय होनी चाहिए।

शिक्षकों पर और भी बहुत से काम लादे जाते हैं जैसे कि चुनावी ड्यूटी। इसमें अपने घर से दूर मतदान केंद्र पर तड़के सुबह पहुंचकर ईवीएम जमा होने तक अर्थात देर रात तक रुकना पड़ता है। चुनाव आयोग यह काम शिक्षकों की बजाय शिक्षित बेरोजगारों को दे सकता है जिससे उनकी थोड़ी-बहुत कमाई हो जाएगी। शिक्षकों को सर्वेक्षण, स्वाधीनता दिवस व गणतंत्र दिवस पर रैली निकालने, पालतू प्राणियों की गणना करने जैसे कितने ही काम दिए जाते हैं जिसका वीडियो उन्हें अधिकारियों को भेजना पड़ता है। सरल, निपुण जैसे ऐप को शैक्षणिक बताकर शिक्षकों के मोबाइल में डाउनलोड किया जाता है। नई शिक्षा नीति का काफी प्रचार किया जाता है लेकिन शिक्षकों के प्रश्नों व समस्याओं को नजरंदाज कर दिया जाता है।

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शिक्षकों से अशैक्षणिक कार्य लेना बेगार नहीं तो क्या है? इससे उनका समय बर्बाद होता है और अध्यापन के काम में व्यवधान आता है। अनेक शैक्षणिक संस्थाओं में स्थायी नियुक्ति न करते हुए तदर्थ शिक्षक रखे जाते हैं। सारी योग्यताओं के बाद भी संस्थाओं के कर्ताधर्ता मोटी रकम लेकर ही शिक्षक की नियुक्ति करते हैं। सब कुछ जानने पर भी कोई जांच या कार्रवाई नहीं की जाती।

लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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