नवभारत संपादकीय: विजय को शपथ दिलाने में राज्यपाल का अड़ंगा, क्या तमिलनाडु में लगेगा राष्ट्रपति शासन?
Tamil Nadu Political Crisis: तमिलनाडु में त्रिशंकु विधानसभा के बीच TVK नेता विजय और राज्यपाल के बीच ठन गई है। बहुमत के जादुई आंकड़े और राजभवन की शर्तों ने राज्य में संवैधानिक संकट पैदा कर दिया है।
- Written By: आकाश मसने
TVK नेता विजय (डिजाइन फोटो)
Vijay Vs Governor In Tamil Nadu: ऐसे कितने ही उदाहरण हैं कि किसी राज्य की विधानसभा त्रिशंकु चुनी जाने पर राज्यपाल ने अकेली सबसे बड़ी पार्टी के नेता को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। जब 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 193 सीटें मिली थीं और फिर भी उसके सदस्य दूसरी पार्टियों से ज्यादा थे तब तत्कालीन राष्ट्रपति ने राजीव गांधी को अकेली सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था। उस समय राजीव ने विनम्रतापूर्वक यह ऑफर अस्वीकार कर दिया था।
फिलहाल तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाया है। 234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 118 विधायकों का समर्थन चाहिए। राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने विजय को फिर यह कहते हुए राजभवन से लौटाया कि 118 विधायकों के हस्ताक्षर लेकर आओ तभी शपथ विधि होगी। केवल समर्थन पत्र या मौखिक दावे पर्याप्त नहीं होंगे। केवल सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा राज्यपाल को स्वीकार्य नहीं है।
विजय के पास कितने विधायकों का समर्थन ?
टीवीके नेता विजय की पार्टी ने 108 सीटों पर जीत हासिल की लेकिन विजय 2 सीटों पर जीते थे। एक सीट उन्हें खाली करनी पड़ेगी। इस तरह पार्टी के पास कुल 107 सीटें हैं। उन्हें बहुमत के लिए 11 सीटें कम पड़ रही हैं। कांग्रेस की 5 सीटों के समर्थन से भी काम नहीं बन रहा है।
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विजय ने दी विधायकों के इस्तीफे की चेतावनी
यद्यपि पहले एमके स्टालिन ने कहा था कि वह अगले 6 महीने तक टीवीके को अस्थिर करने की कोशिश नहीं करेंगे लेकिन कुछ घंटे बाद इस खबर ने हड़कंप मचा दिया कि डीएमके अपनी पुरानी प्रतिद्वंद्वी एआईएडीएमके के साथ मिलकर सरकार बनाने की संभावना तलाश रही है। उधर विजय ने स्पष्ट चेतावनी दे दी हैं कि अगर ऐसा कुछ हुआ तो उनकी पार्टी के सभी 107 विधायक इस्तीफा दे देंगे।
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इस तरह के माहौल में यदि राज्यपाल ने विजय को शपथ दिलाने में देरी की तो तमिलनाडु में राष्ट्रपति शासन लगाने की स्थिति आ सकती है। इतने चुनावी खर्च के बाद कौन विधायक चाहेगा कि राष्ट्रपति शासन लगने की नौबत आ जाए।
इन सारी स्थितियों को देखते देश के पूर्व अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी तथा कुछ अन्य कानून विशेषज्ञों ने राय दी कि राज्यपाल राजभवन को विधानसभा का प्रतिरूप न बनाएं। वह विजय पर यह दबाव न डालें कि वह अपना बहुमत राजभवन में साबित करे न कि विधानसभा में! राज्यपाल को चाहिए कि सबसे बड़ी पार्टी के नेता को मौका दें। बाद में वह विधानसभा में अपना बहुमत साबित कर सकता है। विधिवेत्ता संजय हेगड़े ने कहा कि राज्यपाल बीजेपी का राजनीतिक खेल खेल रहे हैं और जनादेश को नकार रहे हैं। वह संवैधानिक नियमों, मर्यादाओं व पिछली मिसालों का पूरी तरह उल्लंघन है। कपिल सिब्बल ने भी कहा कि राज्यपाल बीजेपी के एजेंट की तरह काम कर रहे हैं।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
