नवभारत संपादकीय: भारत में कम्युनिस्ट राजनीति का पतन, वामपंथी शासन का अंतिम किला ढहा

Left Politics Decline: केरल चुनाव परिणाम के साथ भारत में कम्युनिस्ट राजनीति के कमजोर पड़ने की चर्चा तेज हुई। बंगाल और त्रिपुरा में भी वामपंथी शासन पहले ही समाप्त हो चुका है।
Navabharat Editorial: The Decline of Communist Politics in India—The Last Bastion of Leftist Rule Crumbles
केरल में पिनराई विजयन(सोर्स: सोशल मीडिया)
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Communist Rule end India: केरल विधानसभा के चुनाव नतीजे के साथ ही देश में कम्युनिस्ट शासन का अंतिम किला बहकर खंडहर में बदल गया। 50 वर्षों बाद आज कम्युनिस्ट किसी भी सरकार का हिस्सा नहीं हैं। 2011 में बंगाल में 34 वर्षों से चली आ रही लेफ्ट पार्टियों की हुकूमत खत्म हो गई थी। ज्योति बसु के बाद सीएम बने बुद्धदेव भट्टाचार्य भी वामपंथी विरासत को बचा नहीं पाए, बंगाल में लेफ्ट को चकनाचूर करने का श्रेय ममता बनर्जी को था, जिनका नेतृत्व सिंगूर आंदोलन से चमका था।

2018 में त्रिपुरा की वामपंथी सरकार की जड़ें बीजेपी ने खोद डाली। एक समय वह भी था, जब कम्युनिस्टों का देश की राजनीति व ट्रेड यूनियन आंदोलन में काफी दबदबा था। जब रूस की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव निकिता कुश्चेव और प्रधानमंत्री बुल्गानिन भारत आए थे, तो कोलकाता में उन्हें देखने आई लाखों लोगों की भीड़ देखकर चकित हो गए थे।

उन्हें विश्वास हो गया था कि भारत में कम्युनिज्म बहुत मजबूत है। यद्यपि प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने केरल की नंबूदरीपाद के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट सरकार को 1959 में बर्खास्त कर वहां राष्ट्रपति शासन लगवाया था, लेकिन जब इंदिरा गांधी सत्ता में आई, तो उन्हें कम्युनिस्ट नेता श्रीपाद अमृत डांगे का समर्थन मिला था। इंदिरा मंत्रिमंडल में भी मोहनकुमार मंगलम व डी।पी। धर जैसे कम्युनिस्ट विचारधारा वाले नेता शामिल किए गए थे।

चीन के हमले के बाद कम्युनिस्टों में फूट पड़ गई थी। चीन समर्थक माकपा तथा दूसरा गुट भाकपा कहलाया। माकपा में ज्योति बसु, हरकिशन सिंह सुरजीत, सीताराम येचुरी, सोमनाथ चटर्जी, प्रकाश खरात जैसे नेता थे, तो भाकपा में ए. बी. बर्धन, इंद्रजीत गुप्त आदि थे।

सोमनाथ चटर्जी लोकसभा में स्पीकर रहे, लेकिन जब मनमोहन सिंह सरकार ने अमेरिका से परमाणु करार किया, तो पार्टी के आदेश पर सोमनाथ ने स्पीकर पद से इस्तीफा दे दिया था। कम्युनिस्टों की ताकत भूमिसुधार आंदोलन व श्रमिकों के संगठनों की वजह से थी। जब सोवियत संघ का विघटन हो गया और चीन ने सरकार द्वारा संरक्षित पूंजीवाद को अपना लिया, तब भी भारत के 3 राज्यों में कम्युनिस्टों का वर्चस्व बना हुआ था।

माओवादी ताकतों की वजह से देश में नक्सलियों ने पैठ जमाई थी। वे खुद को मार्क्सवादी-लेनिनवादी कहते थे। तेलंगाना में एक समय भारी हिंसा कम्युनिस्टों ने भड़काई थी। केंद्र सरकार ने सख्त रुख अपनाकर नक्सलवाद खत्म करवाया, जो देश के लिए नासूर बन गया था।

कम्युनिस्टों के विकल्प के रूप में समाजवाद उभरा जो अहिंसक था। लोहिया-जेपी की समाजवादी विरासत की मुलायम व लालू ने दुर्गति कर दी। भूमंडलीकरण के बाद सभी और बड़ा बदलाव आ गया। ट्रेड यूनियन अआंदोलन लुप्त होता चला गया। ठेका पद्धति आ गई। अब वामपंथ के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग चुका है।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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