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नवभारत विशेष: अपने ही फैसले रद्द करना सुप्रीम कोर्ट का साहस
- Written By: दीपिका पाल
Aravalli Hills Verdict : उन्नाव केस में कुलदीप सेंगर की जमानत और अरावली पर्वतमाला पर आदेश रद्द कर सुप्रीम कोर्ट ने दिखाया कि न्याय अंतिम सत्य नहीं, बल्कि निरंतर समीक्षा से परिपक्व होने वाली प्रक्रिया।

सुप्रीम कोर्ट
नवभारत डिजिटल डेस्क: हाल के अपने एक फैसले और उच्च न्यायालय के एक अन्य फैसले को 29 दिसंबर को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अगली सुनवाई तक स्थगित करना कोई विरोधाभास नहीं, बल्कि न्याय प्रक्रिया की परिपक्वता का प्रमाण है। दो बिल्कुल अलग फैसले, जिनमें से एक का संबंध उन्नाव दुष्कर्म मामले में जेल में बंद कुलदीप सिंह सेंगर से और दूसरे का संबंध अरावली पर्वतमालाओं से है, साफ पता चलता है कि सर्वोच्च न्यायालय, न्याय प्रक्रिया में जीवंत हस्तक्षेप करता है। सेंगर के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, ‘न्यायपालिका कोई ईश्वरीय संस्था नहीं, बल्कि मानवीय विवेक पर टिकी व्यवस्था है, इसलिए गलती किसी से भी हो सकती है।’
दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 दिसंबर 2025 को उन्नाव रेप केस में पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर को जमानत दे दी थी। मगर 29 दिसंबर को सर्वोच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने इस मामले में दोनों पक्षों की करीब 40 मिनट तक दलीलें सुनीं। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, ‘कोर्ट को लगता है कि मामले में अहम सवालों पर विस्तार से विचार करना जरूरी है। आम तौर पर कोर्ट का सिद्धांत है कि किसी दोषी या विचाराधीन कैदी को रिहा कर दिया गया हो, तो बिना उसे सुने ऐसे आदेशों पर रोक नहीं लगाई जाती। लेकिन इस मामले में परिस्थितियां अलग हैं, क्योंकि आरोपी दूसरे मामले में पहले से दोषी ठहराया जा चुका है। ऐसे में दिल्ली हाईकोर्ट के 23 दिसंबर के आदेश पर रोक लगाई जाती है।’ इस मामले में चार हफ्ते बाद दोबारा सुनवाई होगी। सर्वोच्च अदालत ने सेंगर को नोटिस जारी करते हुए इस संबंध में जवाब मांगा है।
इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला की परिभाषा संबंधी अपने ही एक आदेश पर रोक लगा दी है। अब इस मामले में विशेषज्ञों की कमेटी फिर से जांच करेगी। अरावली मामले में जिसे लेकर पिछले कई सप्ताह से देश के अलग-अलग हिस्सों में आंदोलन हो रहे थे, सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘अरावली की परिभाषा को यदि 500 मीटर के दायरे तक सीमित किया जाता है, तो इससे संरक्षण क्षेत्र के सिमटने की संभावना है। कई ऐसे भू-भाग जो अरावली का हिस्सा हैं, वे कानूनी संरक्षण से बाहर हो सकते हैं।’ अतः इस मामले में भी अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को होगी और तब तक के लिए विशेषज्ञ समिति की सिफारिशें और उन पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई टिप्पणियां फिलहाल स्थगित रहेंगी।
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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई तक इन सिफारिशों को किसी भी तरह लागू नहीं किया जाएगा। संविधान में रिव्यू पिटीशन, क्यूरेटिव पिटीशन और बड़ी पीठों की व्यवस्था इसलिए ही की गई है कि अगर धोखे से भी किसी न्याय में कमी रह जाए, तो उसे समय रहते दुरुस्त किया जा सके।
सेंगर व अरावली पर्वतमाला के केस
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह स्वीकार करना कि न्याय अंतिम सत्य नहीं बल्कि निरंतर खोज है, भारतीय विधि व्यवस्था की परिपक्वता को दर्शाता है। शुरुआती दौर में निचली अदालतों और स्थानीय प्रभावों के कारण सेंगर मामले में पीड़िता को न्याय नहीं मिल पा रहा था। ऐसे में जब मामला सर्वोच्च न्यायालय तक मामला पहुंचा, तो सर्वोच्च अदालत ने न केवल ट्रायल को दिल्ली ट्रांसफर किया बल्कि पीड़िता और उसके परिवार की सुरक्षा के लिए तेज सुनवाई की व्यवस्था स्थापित की। साथ ही इस संबंध में निष्पक्ष ट्रायल को प्राथमिकता दी गई। ऐसे में यह साफ है कि पहले सिस्टम से भले चूक हुई हो, पर सर्वोच्च न्यायालय ने उस चूक को स्वीकार कर हस्तक्षेप किया है।
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अरावली पर्वतमाला के संबंध में भी अदालत का यह फैसला पर्यावरणीय न्याय में गहरे आत्ममंथन के अनुरूप है। यहां कोई एक आरोपी नहीं, बल्कि पूरी विकास प्रणाली ही सवालों के घेरे में है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वत में खनन और विनाश को रोकने के लिए कड़े आदेश दिए। लेकिन बाद की समीक्षा से कोर्ट ने महसूस किया कि शायद उनके द्वारा दिए गए फैसले में ‘वन’ की कानूनी परिभाषा अस्पष्ट है। अतः बिना किसी अहं को आड़े आने का मौका दिए सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ही आदेशों के क्रियान्वयन पर अस्थायी रोक लगा दी। हालांकि यह फैसले को पलटना नहीं बल्कि रि-ट्यूनिंग है।
लेख- लोकमित्र गौतम के द्वारा
Supreme court sengar aravali judicial maturity analysis
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