

पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की अमर रचना 'राम की शक्ति-पूजा'।
जामवंत की सलाह पर रावण को हराने राम ने किए 108 नीलकमल अर्पित।
जब परीक्षा लेने माँ दुर्गा ने चुरा लिया था नील कमल।
ऐसी है मानवीय संघर्ष और अटूट आत्मविश्वास की गाथा।
आज है हिंदी साहित्य के महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की पुण्यतिथि।
Lord Ram Shakti Puja: नवरात्रि का पावन पर्व चल रहा है और चारों तरफ माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना की धूम है। जगह-जगह रामलीला का आयोजन हो रहा है, जहाँ लोग भगवान राम के जीवन से प्रेरणा ले रहे हैं।
आज ही के दिन हिंदी साहित्य के महाप्राण पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की पुण्यतिथि भी है। ऐसे में उनकी लिखी कालजयी और मशहूर कविता "राम की शक्ति-पूजा" खुद-ब-खुद याद आ जाती है।
निराला जी ने इस ऐतिहासिक कविता को 23 अक्टूबर 1936 को पूरा किया था। इसके ठीक तीन दिन बाद, यानी 26 अक्टूबर 1936 को यह प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) के प्रसिद्ध दैनिक समाचार पत्र 'भारत' में छपी थी। कुल 312 पंक्तियों वाली यह लंबी कविता निराला जी के प्रसिद्ध काव्य संग्रह 'अनामिका' में शामिल है। इसे उन्होंने अपने खास 'शक्ति पूजा' छंद में पिरोया है।
इस कविता का आधार भले ही रामायण हो, लेकिन इसका मुख्य विषय सिर्फ राम और रावण का युद्ध नहीं है। कविता की शुरुआत युद्ध के मैदान में राम के मन में उठने वाले संशय, डर और निराशा से होती है। रावण अधर्म पर होने के बाद भी अपनी प्रचंड शक्ति से तबाही मचा रहा था।
राम को लगता है कि अधर्म के साथ शक्ति खड़ी है, जिससे उनके मन में हार का डर बैठ जाता है। तब वह इस तबाही से निजात पाने के लिए अपने सहयोगियों के साथ मंत्रणा करते हैं। कृतवास रामायण में दिए गए उल्लेख के अनुसार, जब रावण के साथ युद्ध में जब श्रीराम के बाण विफल होने लगे और वे हताश हो गए, तब जामवंत जी ने उन्हें भगवती शक्ति की उपासना करने का परामर्श दिया था।
राम को इस घोर निराशा से निकालने के लिए रीछराज जामवंत उन्हें एक नया रास्ता दिखाते हैं। जामवंत कहते हैं कि अगर रावण अपनी शक्ति के बल पर आतंक फैला रहा है, तो इसका जवाब साधारण बल से नहीं, बल्कि उससे भी बड़ी आत्मिक साधना से देना होगा। जामवंत की सलाह पर राम माँ शक्तिस्वरुपा दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए 108 नीलकमलों से कठिन पूजा का संकल्प लेते हैं।
पूजा अपने अंतिम चरण में थी कि देवी दुर्गा ने राम की परीक्षा लेने के लिए एक नीलकमल गायब कर दिया। पूजा पूरी करने के लिए एक कमल कम पड़ गया।
इस विषम परिस्थिति में राम को याद आया कि माता उन्हें बचपन में 'राजीव नयन' (कमल जैसी आँखों वाला) कहती थीं। राम ने बिना हिचकिचाए बाण उठाकर अपनी एक आँख माँ दुर्गा के चरणों में अर्पित करने का फैसला कर लिया।
जैसे ही राम अपनी आँख निकालने लगे, महाशक्ति प्रकट हो गईं। उन्होंने राम का हाथ थाम लिया और उन्हें विजय का वरदान दिया। इस प्रसंग का मूल संदेश है- "आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर।" यानी अगर अन्याय शक्तिशाली हो, तो उससे घबराने के बजाय अपने भीतर के आत्मबल और त्याग को और मजबूत करना चाहिए।
निराला ने इस कविता में राम को केवल एक ईश्वर के रूप में नहीं, बल्कि हमारी और आपकी तरह संघर्ष करते एक साधारण इंसान के रूप में दिखाया है।
कविता की एक बहुत सुंदर पंक्ति है- "वह एक और मन रहा राम का जो न थका"। यह पंक्ति सिखाती है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, इंसान की जीने और लड़ने की इच्छा कभी खत्म नहीं होनी चाहिए।
बुद्धि के दुर्ग पहुँचा विद्युतगति हतचेतन
राम में जगी स्मृति हुए सजग पा भाव प्रमन।
"यह है उपाय", कह उठे राम ज्यों मन्द्रित घन
"कहती थीं माता मुझको सदा राजीवनयन।
दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण
पूरा करता हूँ देकर मात एक नयन।"
कहकर देखा तूणीर ब्रह्मशर रहा झलक,
ले लिया हस्त लक लक करता वह महाफलक।
ले अस्त्र वाम पर, दक्षिण कर दक्षिण लोचन
ले अर्पित करने को उद्यत हो गये सुमन
जिस क्षण बँध गया बेधने को दृग दृढ़ निश्चय,
काँपा ब्रह्माण्ड, हुआ देवी का त्वरित उदय।
"साधु, साधु, साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम!"
कह, लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।
देखा राम ने, सामने श्री दुर्गा, भास्वर
वामपद असुर स्कन्ध पर, रहा दक्षिण हरि पर।
ज्योतिर्मय रूप, हस्त दश विविध अस्त्र सज्जित,
मन्द स्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित।
हैं दक्षिण में लक्ष्मी, सरस्वती वाम भाग,
दक्षिण गणेश, कार्तिक बायें रणरंग राग,
मस्तक पर शंकर! पदपद्मों पर श्रद्धाभर
श्री राघव हुए प्रणत मन्द स्वरवन्दन कर।