देश में एक के बाद एक हो रहे रेल हादसे, सिर्फ बयानबाजी तक ही सीमित सुरक्षा उपाय
किसी दुर्घटना के बाद शोक या सहानुभूति जता कर नाममात्र का मुआवजा दे दिया जाता है और फिर अगले हादसे का इंतजार किया जाता है। आज की आधुनिक टेक्नोलॉजी के उपायों का अवलंबन कर दुर्घटनाएं टालने का यथासंभव प्रयास किया जाए।
- Written By: किर्तेश ढोबले
(डिजाइन फोटो)
नवभारत डेस्क: ट्रेन यात्रा अत्यंत असुरक्षित हो चली है। एक के बाद एक दुर्घटना होती चली जाती हैं लेकिन यात्री सुरक्षा के ठोस उपायों को जरा भी प्राथमिकता नहीं दी जाती। जबकि इसे सर्वाधिक तरजीह दी जानी चाहिए, हावड़ा- मुंबई मेल झारखंड के जमशेदपुर में दुर्घटनाग्रस्त हो गई। यह ट्रेन पहले से डिरेल हुई मालगाड़ी की बोगी से जा टकराई। इस हादसे में 18 बोगियां पटरी से उतर गई। 2 यात्रियों की मौत हो गई जबकि 22 घायल हो गए, इनमें 4 रेलकमी हैं।
देश में कुछ ही ट्रेनों में एंटी कोलीजन (टक्कर रोधी) डिवाइस लगाया गया है जबकि इसे सभी यात्री ट्रेनों में लगाया जाना चाहिए ताकि टक्कर होने से पहले ही गाड़ी रुक जाए। कवच नामक यह डिवाइस अभी तक 23,000 में से केवल 59 इंजनों में लगाया गया है। इसके अलावा सिग्नलिंग की व्यवस्था सही होनी चाहिए और ट्रैक की देखरेख तथा परिचालन नियमों का कड़ाई से पालन होना भी जरूरी है। एक ही पटरी पर यदि कई ट्रेन दौड़ती हैं तो उनके बीच सुरक्षित दूरी रहनी चाहिए। ट्रेनों की बढ़ती तादाद देखते हुए अधिक रेलवे ट्रैक बनाए जाएं।
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मालगाड़ी का परिचालन अलग ट्रैक पर हो ताकि फास्ट ट्रेनों के चलने में व्यवधान न आए। इसी तरह पुराने रेलवे पुलों का समुचित रखरखाव, नए पुलों का निर्माण भी किया जाए, बारिश के मौसम में देखरेख बहुत जरूरी है क्योंकि कहीं-कहीं बाढ़ से मिट्टी वह जाने से पटरी अधर में लटक जाती है। अधिक माल ढुलाई तथा ट्रेनों की तादाद बढ़ने से पटरियों पर भार बढ़ गया है।
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पटरियों व स्लीपरों की मजबूती पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। जिन इलाकों में घाट और अधिक मोड़ हैं वहां पर्याप्त सावधानी बरतनी होगी। दुर्घटना की एक वजह लोको पायलट की थकावट भी होता है। यदि उससे 10 घंटे से ज्यादा की ड्यूटी ली गई तो उसे झपकी लगने का अंदेशा रहता है। इंजन रूम में टायलट की व्यवस्था नहीं होने से भी ट्रेन चालकों को असुविधा होती है।
वंदे भारत जैसी ट्रेन पर शरारती व असामाजिक तत्वों द्वारा पथराव किए जाने की घटनाएं सामने आई हैं। इसके लिए रेलवे पुलिस को सख्त रवैया अपनाना होगा। रेलवे ट्रैक की देखरेख करनेवाले स्टाफ की यदि साहबों के बंगले पर ड्यूटी लगी होगी तो क्या रेल की पटरी सुरक्षित रह पाएगी? जहां भी रेलवे के क्लास फोर कर्मियों से बेगार ली जाती है, उस पर रोक लगनी चाहिए, किसी दुर्घटना के बाद शोक या सहानुभूति जता कर नाममात्र का मुआवजा दे दिया जाता है और फिर अगले हादसे का इंतजार किया जाता है। आज की आधुनिक टेक्नोलॉजी के उपायों का अवलंबन कर दुर्घटनाएं टालने का यथासंभव प्रयास किया जाए। लेख चंद्रमोहन द्विवेदी द्वारा
