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आज का संपादकीय: 1984 के दंगों का मामला अपील न करने पर पुलिस को फटकार
सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में जस्टिस धींगरा की अध्यक्षता में एसआईटी गठित की थी जो ऐसे 1999 मामलों की जांच कर रही थी जिनकी जांच-पड़ताल रोक दी गई थी. 650 पंजीबद्ध मामलों में से केवल 362 मामलों में चार्जशीट दाखिल की।
- Written By: दीपिका पाल

आज का संपादकीय (सौ.डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: यदि पुलिस अपने कर्तव्य में ढिलाई बरते तो न्यायपालिका उसे आड़े हाथ लेती है. 1984 के सिख विरोधी दंगों के अभियुक्तों की रिहाई को चुनौती देते हुए दिल्ली पुलिस ने अपील क्यों नहीं दायर की थी इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए. न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की पीठ ने दिल्ली पुलिस का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से कहा कि अभियुक्तों की रिहाई के खिलाफ विशेष अनुमति याचिका दायर करें और इस मामले को गंभीरता से आगे बढ़ाएं. सुप्रीम कोर्ट शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के सदस्य कहलों की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा था. कहलों की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में जस्टिस धींगरा की अध्यक्षता में एसआईटी गठित की थी जो ऐसे 1999 मामलों की जांच कर रही थी जिनकी जांच-पड़ताल रोक दी गई थी. 650 पंजीबद्ध मामलों में से केवल 362 मामलों में चार्जशीट दाखिल की गई थी. इनमें केवल 39 लोगों को सजा सुनाई गई थी. बाकी छूट गए थे।
अभियोजन ने उनकी रिहाई को चुनौती नहीं दी थी. इसे सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस का ढीलापन माना है. जस्टिस धींगरा समिति ने 2020 में पाया था कि अनेक मामलों में जांच अधूरी छोड़ दी गई. यह एक गैरजवाबदार रवैया था. 4 दशक से ज्यादा बीत गए लेकिन दंगा पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाया. जो इन दंगों में किसी प्रकार जीवित बचे, उन्हें लगा कि उनके साथ विश्वासघात किया गया. सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन पक्ष को अपनी गलती सुधारने का अवसर दिया है. दिल्ली पुलिस की यह दलील कि दंगों को लेकर साक्ष्य नहीं मिल पाए, उसकी अक्षमता को दर्शाती है। मामलों को गंभीरता से लिया जाता तो साक्ष्य या प्रमाण अवश्य मिलते. जिन मामलों में जरूरी है वहां नए सिरे से जांच कर गवाह और सबूत जुटाए जाने चाहिए।
यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि अपराधी आजादी से घूमने न पाएं. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के दंगों में सिखों के मकान, पेट्रोलपंप व वाहन जलाए गए थे. हाथ पीछे बांधकर गले में जलता टायर डालकर दौड़ाया गया था. दिल्ली में निर्मम हत्याएं हो रही थीं और पुलिस गायब थी. इस भीषण अराजकता के समय कुछ नेता दंगाइयों को भड़का रहे थे. कांग्रेस नेता जगदीश टाइटलर, सज्जन कुमार व हरिकिशनलाल भगत पर दंगे भड़काने का आरोप था. भगत का निधन हो चुका है. दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने 2 लोगों की हत्या के लिए कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जनकुमार को दोषी ठहराया है. उन्हें 18 फरवरी को सजा सुनाई जाएगी. सज्जन पर आरोप है कि उन्होंने दंगाई भीड़ का नेतृत्व किया और उनके उकसाने के बाद भीड़ ने पिता-पुत्र को जिंदा जला दिया था।
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इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के दंगों में सिखों के मकान, पेट्रोलपंप व वाहन जलाए गए थे. हाथ पीछे बांधकर गले में जलता टायर डालकर दौड़ाया गया था. दिल्ली में निर्मम हत्याएं हो रही थीं और पुलिस गायब थी. इस भीषण अराजकता के समय कुछ नेता दंगाइयों को भड़का रहे थे. कांग्रेस नेता जगदीश टाइटलर, सज्जन कुमार व हरिकिशनलाल भगत पर दंगे भड़काने का आरोप था।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
Police reprimanded for not appealing in 1984 riots case
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